शहडोल। संभाग के अनूपपुर जिले की जनपद पंचायत पुष्पराजगढ़ के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत सरईटोला इन दिनों विकास कार्यों के नाम पर कथित भ्रष्टाचार और बंदरबांट का सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुकी है। शासन और प्रशासन की नाक के नीचे इस आदिवासी बहुल पंचायत को एक खास रसूखदार सिंडिकेट के हवाले किए जाने की चर्चाएं आम हैं। वर्तमान में होल्कर ढाबे के सामने, हाईवे के किनारे पंचायत द्वारा एक पुलिया का निर्माण कराया जा रहा है। कहने को तो इस कार्य की निर्माण एजेंसी खुद ग्राम पंचायत है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह पूरी पंचायत आज भी एक खास निजी सप्लायर फर्म हिंदुस्तान ट्रेडर्स और उसके संचालक के इशारों पर नाच रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि यहां लोकतंत्र नहीं, बल्कि चंद चहेतों की तानाशाही चल रही है।
अंधेरे में लाखों का खेल, इंजीनियर नदारद
हाईवे किनारे बन रही इस पुलिया के निर्माण स्थल पर न तो कोई सूचना बोर्ड लगा है और न ही कार्य से जुड़ी कोई तकनीकी जानकारी सार्वजनिक की गई है। नियम कहते हैं कि हर शासकीय कार्य के स्थल पर प्राक्कलन (स्टीमेट) बोर्ड होना अनिवार्य है, जिसमें कार्य की लागत, मद और स्वीकृतकर्ता का उल्लेख हो, लेकिन यहां सब गोलमाल है। पुलिया कितनी लागत से बन रही है और किस मद का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है, इसका जवाब देने के लिए सरपंच और सचिव तैयार नहीं हैं। मजे की बात तो यह है कि निर्माण स्थल पर पंचायत का कोई भी जिम्मेदार तकनीकी अमला या इंजीनियर मौजूद नहीं रहता। पूरा काम मेट और ऑफ-रिकॉर्ड ठेकेदारों के मजदूरों के भरोसे छोड़ दिया गया है, जिससे घटिया निर्माण और शासकीय राशि के अपव्यय की पूरी आशंका बनी हुई है।
हिंदुस्तान ट्रेडर्स के बिलों की बाढ़
ग्राम पंचायत सरईटोला का प्रभार वैसे तो सचिव सुरेश प्रसाद पाठक के पास है, लेकिन क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि ऑफ द रिकॉर्ड यह पूरा खेल हिंदुस्तान ट्रेडर्स के संचालक आजाद खान के कथित संरक्षण में खेला जा रहा है। स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि यदि बीते कुछ वर्षों में इस पंचायत के भीतर हुए निर्माण कार्यों का बारीकी और निष्पक्षता से तकनीकी ऑडिट कराया जाए, तो कई चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं। आरोप है कि हर छोटे-बड़े निर्माण कार्य में इस खास फर्म के बिल बेधडक़ और धड़ल्ले से लगाए जाते हैं। इतना ही नहीं, पूर्व में उक्त संचालक द्वारा खुद के नाम पर भी फर्म बनाकर सरकारी राशि का आहरण करने के गंभीर आरोप स्थानीय स्तर पर लगते रहे हैं। यदि इन फर्मों के खातों और इनके द्वारा लगाए गए सामग्री प्रदाय के बिलों की जांच हो जाए, तो पंचायत के कर्ताधर्ताओं का पूरा कच्चा-चिटठा बेनकाब हो सकता है।
सवाल पूछने पर घुडक़ी
हैरानी की बात यह है कि जब भी कोई जागरूक नागरिक या मीडियाकर्मी निर्माण स्थल पर जाकर नियमों के तहत जानकारी लेने की कोशिश करता है, तो कथित ऑफ रिकार्ड ठेकेदारों और उनके गुर्गों द्वारा सीधे तौर पर धमकियां दी जाती हैं। सच्चाई को दबाने के लिए यहां साम-दाम-दंड-भेद का खुला खेल चल रहा है। जो भी इस कथित सिंडिकेट के खिलाफ आवाज उठाने की जहमत उठाता है, उसे झूठे मामलों में फंसाने और डराने-धमकाने के हथकंडे अपनाकर चुप कराने का प्रयास किया जाता है, जो पूरी तरह अलोकतांत्रिक है।
सुशासन को ठेंगा, सवालों से बच रहे जिम्मेदार
एक ओर सूबे की भाजपा सरकार जीरो टॉलरेंस और सुशासन का दम भर रही है, वहीं दूसरी ओर पुष्पराजगढ़ के इस सुदूर क्षेत्र में एक विशेष वर्ग और खास फर्म के माध्यम से लाखों रुपये के सरकारी फंड के कथित दुरुपयोग की शिकायतें आ रही हैं। पंचायत के सरपंच, सचिव और जिम्मेदार अधिकारी इस पूरे मामले में रहस्यमयी चुप्पी साधे हुए हैं। जब भी उनसे इस संबंध में आधिकारिक पक्ष मांगा जाता है, तो वे कैमरे और तीखे सवालों से बचकर भागते नजर आते हैं। आखिर किसके वरदहस्त पर बिना सूचना बोर्ड के यह संदिग्ध निर्माण कार्य चल रहा है? हिंदुस्तान ट्रेडर्स पर पंचायत की इतनी मेहरबानी क्यों है? इन गंभीर सवालों के बीच जागरूक नागरिकों ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष तकनीकी जांच कर दोषियों पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है।
अजय पाल

