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बांग्लादेश में हिंदुओं पर बढ़ती कट्टरता और भारत की किंकर्तव्यविमूढ़ता 

बांग्लादेश

बांग्लादेश में हिंदू समुदाय लंबे समय से उत्पीड़न और कट्टरता का शिकार हो रहा है। यह समस्या एक धार्मिक और राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है, जिसमें भारत जैसे पड़ोसी और धर्मनिरपेक्ष देश की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। हालांकि, भारत की प्रतिक्रिया अक्सर आधी-अधूरी और अनिर्णायक रही है। यह स्थिति न केवल भारत के नैतिक और कूटनीतिक कर्तव्यों पर सवाल उठाती है, बल्कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए भी चुनौती बन रही है।

1947 में भारत के विभाजन के समय, बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) में हिंदू आबादी लगभग 30% थी। लेकिन 2022 तक यह घटकर 8% से भी कम रह गई है। यह गिरावट मुख्य रूप से दंगों, पलायन, और धार्मिक उत्पीड़न का परिणाम है।
1965 के “एनिमी प्रॉपर्टी एक्ट” के तहत लाखों हिंदुओं की जमीनें छीन ली गईं। इस कानून का 1971 के बाद “वेस्टेड प्रॉपर्टी एक्ट” के रूप में इस्तेमाल जारी रहा।रिपोर्टों के अनुसार, बांग्लादेश में हिंदुओं की लगभग 2.6 मिलियन एकड़ जमीन जबरन छीन ली गई है, तथा हिंदुओं के धार्मिक स्थलों पर हमले और तोड़फोड़ आम हो गए हैं।
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले नियमित होते रहे हैं। 2013 में शाहबाग आंदोलन के दौरान इस्लामी कट्टरपंथियों ने 50 से अधिक हिंदू मंदिरों और सैकड़ों घरों को नष्ट किया। 2021 में दुर्गा पूजा के दौरान हिंसा में 10 से अधिक हिंदू मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए। कई मंदिर और मूर्तियां तोड़ी गईं, एवं 2023 में हाजीगंज और नोआखाली में हिंदुओं पर भीड़ ने हमला किया, जिसके चलते बड़ी संख्या में हिंदू परिवार पलायन के लिए मजबूर हुए।हिंदू महिलाओं का अपहरण, जबरन धर्मांतरण और बलात्कार एक बड़ी समस्या है। स्थानीय एनजीओ रिपोर्ट्स के अनुसार, हर साल सैकड़ों हिंदू लड़कियों का जबरन धर्मांतरण किया जाता है।
भारत ने बांग्लादेश सरकार पर हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई ठोस दबाव नहीं डाला।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2021 की बांग्लादेश यात्रा के दौरान इस मुद्दे को केवल औपचारिक रूप से उठाया गया,भारतीय उच्चायोग से भी अक्सर कमजोर प्रतिक्रियाएं आई हैं।
हालात यह हैं कि बांग्लादेश से पलायन कर भारत आए हिंदू शरणार्थियों को उचित मान्यता नहीं मिलती। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) 2019 में ऐसे शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान है, लेकिन इसे अभी तक पूरी तरह लागू नहीं किया गया है।
भारत-बांग्लादेश संबंधों में जल बंटवारा, व्यापार, और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दे प्राथमिकता में रहते हैं। हिंदुओं की सुरक्षा का मुद्दा कभी केंद्र में नहीं आता।भारत ने बांग्लादेश में हिंदुओं की समस्या को कभी भी संयुक्त राष्ट्र या अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रभावी ढंग से नहीं उठाया।भारत को बांग्लादेश सरकार पर दबाव डालना चाहिए कि वह धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए सख्त कदम उठाए।भारत को यह स्पष्ट करना होगा कि उसके पड़ोसी संबंध मानवाधिकारों की रक्षा से जुड़े हैं।इसके अलावा भारत को नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) को लागू कर बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थियों को सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए, तथा संयुक्त राष्ट्र, SAARC, और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों में इस मुद्दे को मजबूती से उठाना चाहिए।हिंदुओं के स्वघोषित पुरोधा बने रहने से कुछ नहीं होगा समय आ गया है कि भारत को बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के पुनर्वास के लिए आर्थिक सहायता और सामाजिक विकास योजनाएं शुरू करनी चाहिए तथा ज़रूरत पड़े तो बांग्लादेश में कट्टरपंथ को नियंत्रित करने के लिए भारत को चीन और अन्य देशों से भी समर्थन जुटाना चाहिए।
बांग्लादेश में हिंदुओं पर बढ़ती कट्टरता भारत के लिए एक कूटनीतिक, नैतिक और सांस्कृतिक चुनौती है। भारत को न केवल अपनी सीमाओं के भीतर बल्कि पड़ोसी देशों में भी अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। यदि भारत इस मुद्दे पर चुप रहा, तो यह उसकी धर्मनिरपेक्ष छवि और वैश्विक प्रभाव दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है। हिंदुओं की सुरक्षा और धार्मिक सहिष्णुता सुनिश्चित करना न केवल भारत की जिम्मेदारी है, बल्कि यह दक्षिण एशियाई स्थिरता के लिए भी आवश्यक है।
( राजीव खरे राष्ट्रीय उप संपादक )

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