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ग्राम पंचायत कुआं, फर्जी बिलों का गढ़, 10 हज़ार के रसगुल्ले और बूंदी ने खोली पोल
➡️कटनी
कटनी | भारतीय लोकतंत्र की नींव गांव हैं। गांवों के विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकारें अरबों रुपये की योजनाएँ चलाती हैं। इन योजनाओं को धरातल पर उतारने की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों पर होती है। लेकिन अक्सर यह भी सुनने को मिलता है कि पंचायतें विकास का मंदिर न होकर भ्रष्टाचार की पाठशाला बन गई हैं। ग्राम पंचायत कुँआ का हालिया मामला इसी सच्चाई को उजागर करता है। यहाँ विकास कार्यों के नाम पर फर्जी बिल बनाए गए और हैरत की बात यह रही कि 10 हज़ार रुपये सिर्फ रसगुल्ले और बूंदी खाने में खर्च दिखा दिए गए।
सरपंच सचिव भर रहे अपनी जेब,फर्जी बिलों का खेल
ग्राम पंचायतों में फर्जी बिल बनाने का खेल नया नहीं है। रेत, सीमेंट, गिट्टी जैसी सामग्री की आपूर्ति के बिल बनाए जाते हैं, लेकिन असल में न तो सामग्री आती है और न ही काम पूरा होता है। भोजन, आतिथ्य खर्च में बैठकों, कार्यक्रमों, उत्सवों के नाम पर लाखों रुपये के बिल पेश किए जाते हैं। अधिकारी, सचिव, सरपंच की मिलीभगत से बिल पास कराए जाते हैं। कुँआ पंचायत का मामला इसलिए खास है क्योंकि यहाँ की फर्जीबाज़ी का तरीका बेहद चौंकाने वाला है।सिर्फ मिठाई रसगुल्ले और बूंदी पर 10 हज़ार रुपये खर्च दिखाए गए।सवाल उठता है कि आखिर पंचायत के लोग कौन-सा ऐसा भोज कर रहे थे जिसमें केवल मिठाई पर दस हज़ार का खर्च हो गया?
ग्रामीणों की नाराज़गी, होना चाहिए जांच
इस पूरे मामले को लेकर ग्रामीणों ने प्रशासन से जांच की मांग की है। कई लोग चाहते हैं कि एसडीएम और जनपद सीईओ इस पर कार्रवाई करें।लेकिन ग्रामीणों को यह भी डर है कि “जांच का खेल” भी सिर्फ खानापूर्ति न बन जाए। पहले भी कई बार शिकायतें हुईं, पर नतीजा सिफर रहा।
प्रशासन का रवैया संदेह के घेरे में
सवाल उठता है कि जब इतने फर्जी बिल बन रहे हैं तो प्रशासन चुप क्यों है? क्या अधिकारी भी इसमें हिस्सेदार हैं? क्या पंचायत निरीक्षण सिर्फ कागज़ों पर होता है? क्या भ्रष्टाचार की शिकायतों पर कार्रवाई जानबूझकर टाली जाती है? ग्राम पंचायतें लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई हैं। जब यहीं भ्रष्टाचार पनपने लगे तो लोकतंत्र की नींव कमजोर हो जाती है। जनता का भरोसा टूटता है।गरीबों को उनका हक नहीं मिलता।योजनाएँ सिर्फ भ्रष्टाचारियों की जेबें भरती हैं।
🖋️ पुलिसवाला न्यूज़ कटनी से पारस गुप्ता की रिपोर्ट
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