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गोटमार मेला: परंपरा के खूनी पत्थर, पांढुर्णा में चली बरसों पुरानी रक्तरंजित रस्म

पांढुर्णा / छिंदवाड़ा – गोटमार मेला, छिंदवाड़ा. क्या आपने कभी कोई ऐसी जंग देखी है, जहाँ दो गाँवों के लोग हर साल एक-दूसरे पर बेरहमी से दिनभर पत्थरों की बरसात करते हैं? वो भी किसी अधूरी प्रेम कहानी को याद करने के लिए!पांढुर्णा का विश्व प्रसिद्ध गोटमार मेला इसी परंपरा का जीता-जागता उदाहरण है। इसे आधुनिक भाषा में “ऑनर किलिंग फेस्टिवल” भी कहा जा सकता है।

—गोटमार मेला: आस्था और बर्बरता का संगम छिंदवाड़ा जिले की तहसील पांढुर्णा में हर साल पोला पर्व के दूसरे दिन गोटमार मेले का आयोजन होता है। जाम नदी के दोनों किनारों से पांढुर्णा और सावरगाँव के लोग इकट्ठा होकर एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं।इस खूनी खेल में हर साल सैकड़ों लोग घायल होते हैं और कई अपनी जान भी गंवा बैठते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब प्रशासन, पुलिस और मीडिया की मौजूदगी में होता है।

—प्रशासन की नाकामी प्रशासन हर साल धारा 144 लागू करता है, पुलिस बल तैनात करती है और पत्थरों की जगह रबर की गेंदें या छोटे पत्थर उपलब्ध कराने की कोशिश करती है। लेकिन भीड़ अपनी मनमानी करती है और पत्थरों से ही हमला करती है।शराब और जुए की खुलेआम मौजूदगी इस मेले को और खतरनाक बना देती है। अब तक इस खूनी परंपरा में 14 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोग स्थायी रूप से अपाहिज हो चुके हैं।

—गोटमार मेले की किवदंती: एक अधूरी प्रेम कहानीकहा जाता है कि गोटमार मेले की शुरुआत एक प्रेम प्रसंग से हुई। प्राचीन काल में पांढुर्णा का एक युवक सावरगाँव की युवती से प्रेम करता था। जब दोनों शादी करना चाहते थे, तो युवती का परिवार राजी नहीं हुआ। युवक युवती को भगाकर पांढुर्णा लाने लगा, लेकिन जाम नदी पार करते समय सावरगाँव वालों ने उस पर पत्थरों की बरसात कर दी।युवक के बचाव में पांढुर्णा के लोग भी पत्थरबाजी करने लगे। इस खूनी संघर्ष में प्रेमी-प्रेमिका दोनों की मौत हो गई। उसी घटना की याद में हर साल गोटमार मेला आयोजित किया जाता है।

—धार्मिक आस्था और मान्यता मेले की शुरुआत सुबह माँ चंडिका के पूजन से होती है। जाम नदी के बीच पलाश का पेड़ और झंडा गाड़ा जाता है। पत्थरबाजी के बाद विजयी पक्ष वही माना जाता है, जो झंडे को नदी से निकालकर माँ चंडिका के चरणों में अर्पित करता है।घायल होने वाले लोग भी मान्यता के अनुसार माँ चंडिका के मंदिर की भभूत घाव पर लगाकर दोबारा लड़ाई में कूद पड़ते हैं।

—परंपरा के खूनी पत्थर: परंपरा या अंधविश्वास?शिक्षा और आधुनिकता के बावजूद यह खूनी खेल हर साल और ज्यादा उन्मादी हो रहा है। सवाल यही है कि क्या प्रशासन और समाज इस परंपरा को खत्म कर पाएंगे या फिर आने वाले सालों में भी गोटमार मेला खून से लाल होता रहेगा? अमित मिश्रा ब्यूरो छिंदवाड़ा

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