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हाईवे पर मवेशियों की मौत, प्रशासनिक उदासीनता और अतिक्रमण की त्रासदी

कटनी | कटनी जिले में हाल ही में सामने आई घटनाएँ बेहद गंभीर और चिंता का विषय हैं। हाईवे पर लगातार हो रही गायों की मौत न केवल मानवीय संवेदनाओं को झकझोर रही है, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही और जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता को भी उजागर करती है।कलेक्टर दिलीप कुमार यादव द्वारा बार-बार दिए जा रहे निर्देशों और नियमों को जिस तरह अधिकारी-कर्मचारी धत्ता बता रहे हैं, वह न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है, बल्कि शासन-प्रशासन की जवाबदेही को भी कटघरे में खड़ा करता है। सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि गांवों की सरकारी जमीनें, जिन्हें परंपरागत रूप से ‘चारागाह’ के रूप में चिन्हित किया गया था, आज अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुकी हैं। जहाँ कभी गाय-बैल और अन्य मवेशी स्वतंत्र रूप से चरते थे, वहां अब पक्के मकान, खेत या व्यावसायिक निर्माण खड़े हो गए हैं। परिणामस्वरूप, मवेशियों के पास चरने के लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं बचा। भूख से व्याकुल पशु सड़कों और हाइवे पर आकर चारा ढूँढ़ते हैं और आए दिन किसी न किसी दुर्घटना का शिकार बनते हैं। यह स्थिति सिर्फ पशुओं के लिए ही नहीं, बल्कि आमजन के लिए भी खतरा बन चुकी है। हाईवे पर अचानक दौड़ते मवेशियों के कारण कई बार सड़क हादसे होते हैं, जिनमें निर्दोष लोगों की जान चली जाती है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब जिला प्रशासन को इस समस्या की जानकारी है, तब तक प्रभावी कार्यवाही क्यों नहीं हुई?क्या केवल कलेक्टर के आदेश जारी कर देने से प्रशासन की जिम्मेदारी पूरी हो जाती है? यदि अधिकारी-कर्मचारी ही नियमों को अनदेखा करेंगे तो फिर आमजन से अनुशासन और जिम्मेदारी निभाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यह भी कटु सत्य है कि अतिक्रमण के खिलाफ की जाने वाली कार्यवाही अक्सर कागजों तक ही सीमित रह जाती है। छोटे दुकानदारों और गरीबों के ठेले या झोपड़ियाँ हटाई जाती हैं, लेकिन बड़े और रसूखदार अतिक्रमणकारियों पर प्रशासन चुप्पी साध लेता है। यही दोहरी नीति आज गांवों की चारागाह भूमि को निगल गई है। यदि इस पर समय रहते कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो न केवल मवेशियों के लिए चारे की समस्या बढ़ेगी बल्कि ग्रामीणों और किसानों की कृषि व्यवस्था भी प्रभावित होगी।गांवों की चारागाह भूमि का सर्वे कर अतिक्रमण मुक्त कराया जाए। हाईवे किनारे गौशालाओं और गोचर स्थलों का निर्माण किया जाए, ताकि मवेशी सड़कों पर भटकने न आएं। पशुपालन विभाग और पंचायतों को जवाबदेह बनाया जाए कि वे स्थानीय स्तर पर चारे-पानी की व्यवस्था करें।अधिकारियों-कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय हो और लापरवाही बरतने वालों पर कठोर कार्रवाई हो।गाय और अन्य मवेशी भारतीय समाज और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। इनके संरक्षण की जिम्मेदारी केवल भावनात्मक नहीं बल्कि व्यावहारिक और प्रशासनिक स्तर पर भी सुनिश्चित होनी चाहिए। यदि आज प्रशासन गंभीर नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में यह समस्या और भयावह रूप धारण कर लेगी। कटनी ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए यह चेतावनी है कि यदि सरकारी जमीनों को बचाया नहीं गया और पशुओं के लिए सुरक्षित चारागाह नहीं छोड़े गए, तो हाईवे पर खून से सनी यह त्रासदी बार-बार दोहराई जाएगी। कटनी में गायों की मौत केवल एक हादसा नहीं है, बल्कि यह उस गहरी समस्या का लक्षण है जिसे प्रशासन वर्षों से नज़रअंदाज़ करता आया है। यह समय है कि जिला प्रशासन, पंचायतें और जनप्रतिनिधि एकजुट होकर ठोस कदम उठाएँ। वरना हाईवे पर मवेशियों की मौत और आमजन की सुरक्षा, दोनों ही प्रश्न बने रहेंगे।
🖋️ पुलिसवाला न्यूज़ कटनी से पारस गुप्ता की रिपोर्ट

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