सिंहपुर पुलिस की लचर कार्यप्रणाली पर खड़े हुए गंभीर सवाल

 

शहडोल। विकास की आड़ में मजदूरों के खून से हाथ रंगने और रसूख के दम पर मौत का सौदा करने का एक रूह कंपा देने वाला अमानवीय चेहरा शहडोल में उजागर हुआ है। सिंहपुर थाना क्षेत्र के ग्राम पठरा में आरएस इंफ्रा प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के 400 के.व्ही. बिजली पावर टावर निर्माण के दौरान सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाने के कारण बिहार निवासी 39 वर्षीय गरीब मजदूर अनोज सिंह की असमय जान चली गई, लेकिन इससे भी ज्यादा घिनौना और आपराधिक खेल हादसे के बाद शुरू हुआ। ठेका कंपनी और हातमी हॉस्पिटल प्रबंधन ने मिलकर पुलिस केस, भारी-भरकम मुआवजे और कानूनी शिकंजे से बचने के लिए इंसानियत का जनाजा निकाल दिया। 13 दिनों तक चले कथित इलाज के बाद जब मजदूर ने दम तोड़ा, तो बिना पुलिस को सूचना दिए, बिना एमएलसी  बनाए और बिना पोस्टमार्टम कराए शव को कचरे की तरह एक साधारण गाड़ी में लादकर यूपी-बिहार की सीमा पार ठिकाने लगाने की साजिश रच दी गई। यदि ऐन वक्त पर मृतक के परिजनों ने हिम्मत दिखाकर बनारस हाईवे से एम्बुलेंस को वापस शहडोल न मोड़ा होता, तो इस गरीब मजदूर की मौत की फाइल हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर दी जाती।

 

सुरक्षा साधनों को ठेंगे पर रखकर कराया जा रहा था काम

 

बिहार के खगडिय़ा जिले के ग्राम भिरिया निवासी अनोज सिंह पिता प्रकाश सिंह उम्र 39 वर्ष अपने परिवार का पेट पालने के लिए शहडोल आया था। वह आरएस इंफ्रा प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में ठेकेदार वासुदेव सिंह और उसके बेटे पवन कुमार निवासी पसराहा, खगडिय़ा, बिहार के अंडर में काम कर रहा था। गत 3 जुलाई 2026 को दोपहर 11 से 12 बजे के बीच ग्राम पठरा स्थित टावर लोकेशन 44/0 में टावर खड़ा करने का जोखिम भरा काम कराया जा रहा था। प्रत्यक्षदर्शियों मदन कुमार, अमरेश कुमार, ज्वाला सिंह और अबोध कुमार के अनुसार, ठेकेदार और उसके बेटे ने मजदूरों को ऊंचाई पर काम करने के लिए कोई भी सुरक्षा उपकरण (जैसे सेफ्टी बेल्ट, हेलमेट या नेट) उपलब्ध नहीं कराए थे। अचानक संतुलन बिगडऩे से अनोज सिंह सैकड़ों फीट ऊंचे टावर से सीधे नीचे आ गिरा। सिर, बाएं कंधे, रीढ़ की हड्डी और दाहिने पैर में आई बेहद गंभीर चोटों के कारण वह खून से लथपथ होकर तड़पने लगा।

 

फिर रची गई साक्ष्य मिटाने की साजिश

 

गंभीर रूप से घायल मजदूर को उपचार के लिए विचारपुर स्थित हातमी हॉस्पिटल शहडोल में भर्ती कराया गया। 13 दिनों तक अस्पताल के भीतर कई संदिग्ध ऑपरेशन किए गए। पहले सिर, फिर पैर और आखिर में पीठ पलटाकर कंधे के पास ऑपरेशन करने की चर्चाएं हैं। खबर तो यह भी है कि ऑपरेशन टेबल पर ही मजदूर ने दम तोड़ दिया था। आखिरकार 16 जुलाई 2026 को सुबह 8:35 बजे इलाज के दौरान अनोज की मृत्यु हो गई। मौत होते ही अस्पताल प्रबंधन और ठेकेदारों की मिलीभगत से साजिश पर काम शुरू हुआ। परिजनों  के सदमे का फायदा उठाकर बिना पुलिस को सूचना दिए, बिना पोस्टमार्टम के शव को गृह ग्राम ले जाने के लिए एक तथाकथित लिखित सहमति तैयार करा ली गई। गर्मी के बावजूद शव को सडऩे से बचाने के लिए बिना पर्याप्त बर्फ के, एक साधारण वाहन में ठूंसकर आधी रात को यूपी-बिहार बॉर्डर पार कराने का प्लान बनाया गया, ताकि मामला शहडोल पुलिस और कानून की नजरों से हमेशा के लिए गायब हो जाए।

परंतु, रास्ते में जब मृतक के भाई सनोज सिंह को अहसास हुआ कि ठेकेदार और अस्पताल प्रबंधन ने मिलकर उसके भाई की बलि चढ़ा दी है और वे कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए शव को भगा रहे हैं, तब परिजनों ने बनारस के पास से गाड़ी को वापस मोड़ा और शव को सीधे जिला अस्पताल शहडोल के शव गृह में रखवाकर पोस्टमार्टम की मांग की। शनिवार को जब कोतवाली पुलिस की मौजूदगी में पोस्टमार्टम हुआ, तब इस पूरे खेल का पर्दाफाश हुआ।

 

जांच अधिकारी और थाना प्रभारी की संदिग्ध भूमिका

 

इस पूरे संगीन मामले में सिंहपुर पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं। मर्ग क्रमांक 19/2026 धारा 194 बीएनएस की जांच का जिम्मा प्रधान आरक्षक सुभाष महोबिया को सौंपा गया है। मर्ग जांच के दौरान यह पूरी तरह साबित हो चुका है कि ठेकेदार वासुदेव सिंह और उसके बेटे पवन कुमार की आपराधिक लापरवाही के कारण मजदूर की मौत हुई। इसके आधार पर पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ धारा 106(1), 3(5) बीएनएस के तहत अपराध तो पंजीबद्ध कर लिया, लेकिन पुलिस का ढुलमुल रवैया हैरान करने वाला है। सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि जिस थाना प्रभारी सतेन्द्र चतुर्वेदी के सामने इतना बड़ा मामला कायम हुआ, वे गोलमोल जवाब देते नजर आए। जब उनसे इस संबंध में पूछा गया तो उनका गैर-जिम्मेदाराना बयान सामने आया कि मामला तो पंजीबद्ध हुआ है, लेकिन उन्हें मामले की पूरी जानकारी नहीं है। शहर के जागरूक नागरिकों और विधि विशेषज्ञों का कहना है कि थाना प्रभारी के सामने इतना बड़ा आपराधिक केस दर्ज हो जाए और उन्हें खबर तक न हो, यह बात गले से नीचे नहीं उतरती। क्या थाना प्रभारी और जांच अधिकारी प्रधान आरक्षक सुभाष महोबिया, रसूखदार ठेका कंपनी और हातमी हॉस्पिटल प्रबंधन को बचाने के लिए जानबूझकर ढिलाई बरत रहे हैं? आखिर क्यों अब तक किसी जिम्मेदार की गिरफ्तारी नहीं हुई और न ही घटनास्थल (साइट) को सील किया गया?

 

हातमी हॉस्पिटल पर क्यों नहीं हुई एफआईआर

 

कानूनविदों और प्रबुद्ध नागरिकों का स्पष्ट मानना है कि इस पूरे मामले में हातमी हॉस्पिटल प्रबंधन मुख्य सह-आरोपी है। चिकित्सीय और प्रशासनिक नियमावली के तहत किसी भी सडक़ दुर्घटना, ऊंचाई से गिरने या संदेहास्पद चोट के केस में अस्पताल की पहली वैधानिक जिम्मेदारी होती है कि वह तत्काल संबंधित पुलिस थाने को एमएलसी की सूचना दे। 13 दिनों तक एक बेहद गंभीर घायल मरीज का इलाज छिपाना, मौत के बाद बिना पुलिस पंचनामे और बिना मर्चुरी नियमों के शव को बाहर भेजना मेडिकल काउंसिल के नियमों और भारतीय न्याय संहिता का खुला उल्लंघन है।  भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत पुलिस को सूचना न देने, एमएलसी न काटने और साक्ष्य छुपाने के जुर्म में अस्पताल के मुख्य प्रबंधक और डॉक्टरों पर तत्काल एफआईआर दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को तत्काल प्रभाव से हातमी हॉस्पिटल का क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के तहत पंजीयन और लाइसेंस निरस्त करना चाहिए। कड़ी कानूनी सलाह के बावजूद, पुलिस ने केवल ठेकेदारों पर मामला दर्ज कर हातमी हॉस्पिटल को पूरी तरह से क्लीन चिट जैसी राहत दे दी है, जो अपने आप में एक बड़ा संदेह पैदा करता है।

 

पुलिस अधीक्षक ने संभाला मोर्चा

 

जहां एक तरफ स्थानीय पुलिस की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ शहडोल के कर्तव्यनिष्ठ और सख्त पुलिस अधीक्षक डॉ. संजय अग्रवाल ने इस संवेदनशील मामले को गंभीरता से लेते हुए खुद संज्ञान में लिया है। एसपी डॉ. संजय अग्रवाल ने जिले के पुलिस कप्तान के रूप में अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा है कि मामला बेहद गंभीर है। पूरे प्रकरण का निष्पक्ष और गहन अनुसंधान कराया जायेगा, जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, चाहे वह ठेका कंपनी हो, ठेकेदार हों या अस्पताल प्रबंधन कानून के मुताबिक किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा और सख्त से सख्त वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। एसपी के इस आश्वासन के बाद पीडि़त परिवार और आम जनता में न्याय की उम्मीद जगी है।

 

 

अजय पाल

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