राजस्व विभाग की मनमानी सीमांकन प्रक्रिया, किसानों के लिए परेशानी का सबब
कटनी | राजस्व विभाग द्वारा किए जा रहे सीमांकन कार्य आज किसानों के लिए राहत के बजाय परेशानी का कारण बनते जा रहे हैं। खेत-खलिहान से लेकर कागज़ों तक, हर स्तर पर किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। कहीं नपाई किसी और की हो रही है, तो कहीं वर्षों पुराने रिकॉर्ड अचानक गायब बताए जा रहे हैं। कलम की एक लकीर से जमीन की हदें बदल दी जा रही हैं और किसान दर-दर भटकने को मजबूर है।सीमांकन का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए जमीन की सही सीमा तय करना, विवादों का समाधान करना और किसानों को सुरक्षा देना। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है।कई गांवों में यह प्रक्रिया किसानों के लिए शोषण और मानसिक उत्पीड़न का जरिया बन चुकी है।
कहीं और की नपाई, कहीं और का कब्जा
किसानों का आरोप है कि सीमांकन के दौरान वास्तविक जमीन की बजाय कागज़ी नक्शों के आधार पर मनमाने तरीके से नपाई की जा रही है। कई मामलों में जिस खेत की नपाई होनी चाहिए, वहां न जाकर किसी दूसरे खसरे की नपाई कर दी जाती है। इसका सीधा नुकसान किसान को उठाना पड़ता है, क्योंकि उसकी जमीन का रकबा कम या ज्यादा दिखा दिया जाता है। कुछ किसानों का कहना है कि सीमांकन के समय उन्हें बुलाया ही नहीं जाता, और बाद में तैयार रिपोर्ट थमा दी जाती है। जब किसान आपत्ति करता है तो कहा जाता है कि “रिकॉर्ड में यही दर्ज है”। सवाल यह उठता है कि यदि रिकॉर्ड गलत है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
पुराने रिकॉर्ड आखिर गए कहां?
राजस्व विभाग के पास वर्षों पुराने दस्तावेज, नक्शे, बी-1, खसरा, खतौनी जैसे अहम रिकॉर्ड सुरक्षित होने चाहिए थे। लेकिन जब किसान इन रिकॉर्डों के आधार पर अपनी बात रखता है, तो जवाब मिलता है कि “रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है” या “पुराना रिकॉर्ड नष्ट हो चुका है”।
यह स्थिति बेहद गंभीर है। अगर सरकारी रिकॉर्ड ही सुरक्षित नहीं हैं, तो किसान अपनी जमीन का हक कैसे साबित करे? क्या यह लापरवाही है या जानबूझकर की गई अनदेखी यह जांच का विषय है। कई मामलों में पुराने रिकॉर्ड गायब होने के बाद नए सिरे से सीमांकन कर जमीन की स्थिति बदल दी गई, जिससे किसान को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
कलम की ताकत से बदली जा रही जमीन की हदें
किसानों का कहना है कि आज खेतों की सीमा ट्रैक्टर या मेजरिंग टेप से नहीं, बल्कि कलम से तय हो रही है। राजस्व कर्मियों द्वारा रिपोर्ट में मनचाहे बदलाव कर दिए जाते हैं। कहीं रास्ता खेत में जोड़ दिया जाता है, तो कहीं सिंचित भूमि को गैर-सिंचित दिखा दिया जाता है। एक छोटी-सी एंट्री किसान की पूरी जिंदगी बदल सकती है। जमीन ही किसान की सबसे बड़ी पूंजी होती है। उसमें फेरबदल कर उसे कमजोर करना सीधे-सीधे उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
पैसे के दम पर बदलते नक्शे
कई किसानों ने आरोप लगाए हैं कि सीमांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है। जिनके पास पैसे और पहुंच है, उनके पक्ष में सीमांकन कर दिया जाता है, जबकि साधारण किसान की सुनवाई नहीं होती। रिश्वतखोरी और दबाव की बातें खुलेआम सामने आ रही हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिलते हैं। राजस्व विभाग का यह रवैया न केवल व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि कानून के राज को भी कमजोर करता है।
आपत्ति लगाने पर बढ़ाई जाती है परेशानी
सीमांकन रिपोर्ट पर जब किसान आपत्ति दर्ज कराता है, तो उसे समाधान देने की बजाय और उलझा दिया जाता है। कभी तहसील भेजा जाता है, कभी एसडीएम कार्यालय के चक्कर कटवाए जाते हैं। महीनों तक फाइलें आगे-पीछे घूमती रहती हैं, लेकिन फैसला नहीं होता।
कई किसानों का कहना है कि आपत्ति लगाने के बाद अधिकारियों का रवैया और सख्त हो जाता है। उन्हें डराया-धमकाया जाता है कि ज्यादा बोलोगे तो नुकसान होगा।
न्याय की गुहार, लेकिन सुनवाई नहीं
किसान प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और नेताओं तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। ज्ञापन दिए जा रहे हैं, आवेदन लगाए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव नजर नहीं आ रहा। किसानों की मांग है कि सीमांकन प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच हो, पुराने रिकॉर्ड को आधार बनाया जाए, और किसान की मौजूदगी में ही नपाई की जाए। साथ ही दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी मनमानी न हो।
🖋️ पुलिस वाला न्यूज़ कटनी से पारस गुप्ता की रिपोर्ट

