ई-उपार्जन केंद्र में भूमि फर्जीवाड़ा अन्य की कृषि भूमि को अपनी बताकर धान विक्रय और किसान क्रेडिट कार्ड निर्माण का गंभीर मामला
कटनी/ बहोरीबंद
कटनी | कृषि उपज के ई-उपार्जन की व्यवस्था किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से लागू की गई थी, लेकिन जमीनी स्तर पर यह व्यवस्था कई स्थानों पर भ्रष्टाचार, कूटरचना और आपराधिक मिलीभगत का शिकार होती दिखाई दे रही है।ऐसा ही एक गंभीर मामला कटनी जिले की बहोरीबंद तहसील की प्राथमिक कृषि साख समिति बहोरीबंद के अंतर्गत अरुण प्रताप बियर हाउस मैं पदस्थ कंप्यूटर ऑपरेटर का ग्राम मुरावल की कृषि भूमि से जुड़ा मामला सामने आया है, जिसमें अन्य व्यक्ति की भूमि को कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर अपनी बताकर न केवल ई-उपार्जन केंद्र में पंजीयन कराया गया, बल्कि धान की बिक्री कर सरकारी राशि का आहरण भी कर लिया गया। प्राप्त तथ्यों के अनुसार ग्राम मुरावल, तहसील रीठी की कृषि भूमि मूलतः पंकज सिंह पिता नागेंद्र सिंह के स्वामित्व की है।
उक्त भूमि का विधिवत पंजीयन दिनांक 10 अक्टूबर 2025 को कूटरचित तरीके से पंकज पटेल पिता इंदल पटेल के नाम पर दर्शाया गया । यह पंजीयन वास्तविक स्वामी की जानकारी और सहमति के बिना किया गया, जो प्रथम दृष्टया गंभीर आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है । इस फर्जीवाड़े का उद्देश्य केवल भूमि हड़पना नहीं था, बल्कि सरकारी योजनाओं का अनुचित लाभ उठाना भी था।कूटरचित पंजीयन के आधार पर उक्त भूमि को ई-उपार्जन प्रणाली में पंजीकृत कराया गया । चौंकाने वाली बात यह है कि यह भूमि वास्तविक रूप से रीठी तहसील के ग्राम मुरावल में स्थित है, किंतु जानबूझकर इसे बहोरीबंद धान खरीदी केंद्र में पंजीकृत कराया गया। यह कार्य बिना स्थानीय जांच, सत्यापन और भौगोलिक मिलान के संभव नहीं है, जिससे पंजीकर्ता ऑपरेटर की भूमिका संदेह के घेरे में आती है । जानकारी सामने आने पर जब फर्जीवाड़े के उजागर होने की आशंका बनी, तब मामले को दबाने और वैध दिखाने के उद्देश्य से दिनांक 3 नवंबर 2025 को एक सिकमी (शपथ) पत्र तैयार कराया गया।यह शपथ पत्र स्वयं में संदेहास्पद है, क्योंकि यह फर्जीवाड़ा सामने आने के बाद लिया गया, न कि भूमि पंजीयन या ई-उपार्जन पंजीकरण के पूर्व। स्पष्ट है कि यह शपथ पत्र एक बचावात्मक दस्तावेज के रूप में तैयार किया गया, जिससे अपराध को वैधानिक आवरण दिया जा सके।इसी कूटरचित भूमि अभिलेखों के आधार पर ई-उपार्जन केंद्र में धान की फसल का विक्रय किया गया और सरकारी दर पर भुगतान की राशि का आहरण कर लिया गया । यह न केवल वास्तविक किसान के अधिकारों का हनन है, बल्कि शासन को भी आर्थिक क्षति पहुँचाने वाला कृत्य है। मामले की गंभीरता यहीं समाप्त नहीं होती। इसी भूमि पर सहकारी समिति प्रबंधक से मिलीभगत कर ₹1,80,000 (एक लाख अस्सी हजार रुपये) का किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) भी फर्जी तरीके से बनवाया गया। किसान क्रेडिट कार्ड का उद्देश्य किसानों को खेती के लिए आसान ऋण उपलब्ध कराना है, लेकिन यहां यह योजना भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती दिखाई देती है। फर्जी किसान क्रेडिट कार्ड जिन भूमि अभिलेखों के आधार पर बनवाया गया, खसरा नंबर 353, 355, 357/1, 357/2 रकबा 1.64 हेक्टेयर, 2.62 हेक्टेयर (कुल लगभग 4.26 हेक्टेयर) उक्त समस्त भूमि पर वास्तविक खेती, स्वामित्व और कब्जे की जांच किए बिना ही बैंक और समिति स्तर पर ऋण स्वीकृत किया गया, जो यह दर्शाता है कि इस पूरे प्रकरण में केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक संगठित तंत्र सक्रिय है। भूमि के वास्तविक स्वामित्व की राजस्व स्तर पर पुनः जांच की जाए । ई-उपार्जन पंजीयन और धान बिक्री की संपूर्ण प्रक्रिया की फॉरेंसिक जांच हो । पंजीकर्ता ऑपरेटर, समिति प्रबंधक और संबंधित बैंक अधिकारियों की भूमिका की जांच कर उनके विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए । फर्जी तरीके से आहरित राशि की वसूली की जाए । दोषियों पर भारतीय दंड संहिता की कूटरचना, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र की धाराओं में कार्रवाई की जाए।
🖋️ पुलिसवाला न्यूज़ कटनी से पारस गुप्ता की रिपोर्ट
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