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इंदौर मध्य प्रदेश आचार्य श्री वीररत्नसूरीश्वरजी म.सा. एवं आचार्य श्री पद्मभूषणरत्न सूरीश्वरजी म.सा. आदिठाणा 22 का
श्री वीररत्नसूरीश्वरजी की शुभ आशीष व नीश्रा थी एवं है, अब दिव्य आशीष भी है
आज श्रीमद् विजय वीररत्नसूरीश्वरजी महाराजा की दूसरी मासिक पुण्य तिथि के अवसर पर मुनिराज श्री ऋषभरत्नविजयजी ने आचार्य श्री के जीवन पर प्रकाश डाला। नदी पार करने के लिये नाव या पुल का उपयोग करते हैं। इसी प्रकार से संसार रूपी नदी को पार करके मोक्ष किनारे तक पहुँचने के लिये संयम जीवन एवं सद्गुरु के आलंबन रूपी जहाज का उपयोग करना पड़ता है। ऐसे सद्गुरु श्री वीररत्नसूरीश्वरजी की शुभ आशीष एवं नीश्रा हमको मिली हुई थी और उनके जाने के बाद सभी को दिव्य आशीष मिल रही है जो और अधिक प्रभावशाली है।
गुरु भगवंत का सानिध्य हमको प्राप्त हुआ एवं उनकी कृपा से श्री संघ इस मुकाम तक पहुंचा है। वे हमेशा ऐसे कार्य करते थे जिससे कम से कम कर्म बंध हों एवं उनका कहना था मेरा आलंबन न लो बल्कि परमात्मा के द्वारा जो कहा गया है वह करो। गुरुदेव श्री माणीभद्र देव के परम उपासक थे एवं उनकी साधना के बल एवं प्रभाव से चमत्कारिक शक्ति उत्पन्न होती थी जो लोगों के कष्ट दूर करने के लिये उपयोग में आयी। धर्म के मार्ग में आने वाली विपत्तियों, विघ्न-बाधाओं को उन्होंने दूर किया है। संपत्ति के साथ-साथ शांति और समाधि को भी आवश्यक बताया, अन्यथा सब व्यर्थ है।
मुनिवर ने कहा तीर्थ पर स्वयं जाना पड़ता है परंतु पर्व स्वयं चलकर आते हैं इसलिये कल से प्रारंभ होने वाले पर्युषण माहपर्व की बधावना एवं आराधना सभी को भावों से भर कर पाँच प्रकार से करना है :- (1) प्रवचन श्रवण – प्रतिदिन गुरु भगवंत के प्रवचन का श्रवण अवश्य करना है क्योंकि सम्पूर्ण जीवन का सार इनमें समाहित है, (2) प्रतिक्रमण – पर्व के आठ दिनों में 17 प्रतिक्रमण एवं कम से कम 1 दिन का पौषध अवश्य करना है, (3) प्रत्यक्खान (पच्चखान) – आठ दिन के तप की आराधना का संकल्प लेना है, (4) प्रभु भक्ति – प्रतिदिन भाव भरी भव्य भक्ति करना है, एवं (5) प्रेम – संसार के सभी जीवों के प्रति प्रेम एवं क्षमा करना और यह पक्का करना है कि, किसी भी जीव की हिंसा न हो।
इस महा पर्व से जुड़े पाँच प्रश्नों – में कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, यहाँ से कहाँ जाने वाला हूँ, मेरा कर्तव्य क्या है एवं में क्या कर रहा हूँ का समाधान इन आठ दिन में होगा ।
मंत्रों का राजा नवकार मंत्र, तीर्थों का राजा शत्रुंजय तीर्थ एवं पर्वों का राजा पर्युषण महापर्व
मुनिवर का नीति वाक्य
“‘अतिक्रमण काल में प्रतिक्रमण, जिन शासन की शान है”
राजेश जैन युवा ने जानकारी में बताया कि, आज श्रीमद् विजय वीररत्नसूरीश्वरजी महाराजा ने जिस कमरे में साधना करते हुए अंतिम सांस ली थी उसका लोकार्पण साधना कक्ष के रूप में किया गया । इसके लाभार्थी नवरतनचंद विनोदचंदजी कोठारी, बनारस साड़ी परिवार हैं एवं इस कक्ष में गुरुदेव की फोटो लगाने के लाभार्थी जयंतिलाल विकास जैन हैं।
रिपोर्ट अनिल भंडारी


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