डिंडौरी मध्यप्रदेश
रिपोर्ट अखिलेश झारिया

बांस की चुनकी के साथ महुआ के फूल-पत्तों का पूजन, बच्चों की दीर्घायु और सुख-स्वास्थ्य की कामना

शहपुरा। संतान की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के साथ बुधवार को शहपुरा क्षेत्र में हरछठ यानी हलषष्ठी पर्व श्रद्धा और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। माताओं ने दिनभर व्रत रखकर विधि-विधान से हरछठ माता की पूजा-अर्चना की और अपनी संतानों के स्वस्थ, सुखी एवं मंगलमय जीवन की कामना की।

सुबह से ही घरों और मोहल्लों में पर्व को लेकर धार्मिक माहौल दिखाई दिया। महिलाओं ने समूह में एकत्रित होकर पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा की और हरछठ व्रत की कथा सुनी। कई स्थानों पर सामूहिक पूजन के चलते वातावरण भक्तिमय बना रहा।

बांस की चुनकी और महुआ की सामग्री का विशेष महत्व

हरछठ की पूजा में बांस की चुनकी के साथ महुआ से जुड़ी सामग्री का भी विशेष महत्व देखने को मिलता है। शहपुरा क्षेत्र में वर्षों से चली आ रही लोक परंपरा के अनुसार महिलाएं पूजन में महुआ के फूल, पत्ते, महुआ की दातून, महुआ का तेल और खली सहित महुआ से प्राप्त विभिन्न सामग्रियों का उपयोग करती हैं। पूजन स्थल पर इन सामग्रियों को विधि-विधान से रखकर हरछठ माता की आराधना की जाती है।

स्थानीय लोक परंपराओं में महुआ केवल वनोपज ही नहीं, बल्कि ग्रामीण और आदिवासी जनजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। यही कारण है कि हरछठ जैसे पारंपरिक पर्व में भी महुआ से जुड़ी वस्तुओं की विशेष भूमिका दिखाई देती है। महिलाओं ने पूजन के दौरान संतान की रक्षा, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार में सुख-शांति की कामना की।

हल और कृषि परंपरा से जुड़ा है पर्व

हरछठ पर्व भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इसे हलछठ, हलषष्ठी और ललही छठ के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस पर्व को भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम से जोड़ा जाता है। भगवान बलराम का प्रमुख आयुध हल होने के कारण इस पर्व में हल और कृषि परंपरा का विशेष महत्व माना गया है।

पारंपरिक खान-पान में भी दिखी लोक संस्कृति

क्षेत्र में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार व्रत रखने वाली महिलाएं इस दिन हल से जुते खेतों में पैदा होने वाले अनाज और सब्जियों के सेवन से परहेज करती हैं। इसके स्थान पर स्थानीय परंपरा के अनुसार तिन्नी और पसही के चावल, महुआ के पकवान सहित अन्य पारंपरिक खाद्य पदार्थों का उपयोग किया जाता है। पूजा और व्रत से जुड़ी सामग्री में भी स्थानीय वन उपज और पारंपरिक वस्तुओं को विशेष स्थान दिया जाता है।

मातृत्व, आस्था और लोक संस्कृति का संगम

हरछठ पर्व मातृत्व की ममता और संतान के प्रति मां की मंगलकामना के साथ स्थानीय लोक संस्कृति को भी जीवंत करता है। शहपुरा क्षेत्र में महिलाओं ने वर्षों से चली आ रही परंपराओं का निर्वहन करते हुए नई पीढ़ी को भी इन रीति-रिवाजों और संस्कारों से परिचित कराया। पूजा-अर्चना के बाद माताओं ने अपनी संतानों के स्वस्थ, दीर्घायु और उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

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