कटनी | प्रदेश एवं केंद्र सरकार भले ही “सबका साथ, सबका विकास” और “मोहन यादव डिजिटल इंडिया” के साथ-साथ ग्राम पंचायतों को आत्मनिर्भर व सर्वसुविधायुक्त बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रहे हो, लेकिन जमीनी हकीकत इन सरकारी दावों और विज्ञापनों से कोसों दूर है। विकास की इस दौड़ में ग्राम पंचायत बुधनवारा आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। गांव के ग्रामीण आज के आधुनिक युग में भी सड़क, नाली, शुद्ध पेयजल, नियमित साफ-सफाई और निर्बाध बिजली जैसी अत्यंत प्राथमिक आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा और प्रशासनिक उदासीनता के कारण ग्रामीणों का जीवन नारकीय बन चुका है।
बुनियादी ढांचे का अभाव जर्जर सड़कें और आवागमन की दुश्वारियां
गांव के सर्वांगीण विकास के लिए सड़कों का सुदृढ़ होना पहली शर्त माना जाता है। यदि गांव में सड़कें अच्छी हों, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापार के रास्ते स्वतः खुल जाते हैं। परंतु ग्राम पंचायत बुधनवारा में आवागमन की व्यवस्था अत्यंत दयनीय है। गांव के मुख्य मार्गों से लेकर अंदरूनी मोहल्लों तक पक्की और समतल सड़कों का सर्वथा अभाव है। कई गलियों में आज तक डामरीकरण या सी.सी. (कंक्रीट) रोड का निर्माण नहीं हो सका है, जिसके कारण ग्रामीणों को आए दिन पैदल चलने में भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जर्जर और गड्ढों से भरी सड़कों के कारण वाहनों में टूट-फूट आम बात हो गई है। बुजुर्गों, मरीजों और छोटे बच्चों के लिए इन रास्तों से गुजरना किसी चुनौती से कम नहीं है। मानसून के दौरान स्थिति अत्यंत भयावह और चिंताजनक हो जाती है। थोड़ी सी बारिश होते ही सड़कें कीचड़ और जलभराव के दलदल में तब्दील हो जाती हैं।जलनिकासी (ड्रेनेज) की कोई व्यवस्थित प्रणाली न होने के कारण बारिश का पानी रास्तों पर हफ्तों जमा रहता है। बारिश के दिनों में गांव में एम्बुलेंस या अन्य चार पहिया वाहनों का आना लगभग असंभव हो जाता है। ऐसी स्थिति में यदि किसी गर्भवती महिला, बुजुर्ग या गंभीर मरीज को तुरंत अस्पताल पहुंचाना हो, तो ग्रामीणों को उन्हें खाट या डोली पर लादकर मुख्य मार्ग तक ले जाना पड़ता है। कई बार सही समय पर इलाज न मिलने के कारण मरीजों की जान पर बन आती है।
जल निकासी की विकट समस्या और बीमारी का पनपता दायरा
ग्राम पंचायत बुधनवारा में जल निकासी की समुचित व्यवस्था न होना ग्रामीणों के स्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ साबित हो रहा है। गांव में अधिकांश स्थानों पर पक्की नालियां बनी ही नहीं हैं। जहां नालियां बनाई भी गई हैं, वे अधूरी हैं या फिर उचित ढलान न होने के कारण जाम पड़ी रहती हैं। नालियों की सफाई न होने और जल निकासी की व्यवस्था न होने से ग्रामीणों के घरों से निकलने वाला इस्तेमाल किया गया पानी और बारिश का पानी रास्तों व खाली भूखंडों पर जमा हो जाता है। जगह-जगह रुके हुए गंदे पानी और कीचड़ के कारण गांव में मच्छरों व अन्य हानिकारक कीटों का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। ग्रामीणों में मलेरिया, डेंगू, चिकुनगुनिया, टाइफाइड और त्वचा संबंधी संक्रामक रोगों के फैलने का लगातार डर बना रहता है। विशेषकर छोटे बच्चे और बुजुर्ग इन बीमारियों की चपेट में सबसे जल्दी आते हैं। शुद्ध पानी की एक-एक बूंद को तरसते ग्रामीण जल ही जीवन है, लेकिन बुधनवारा के निवासियों के लिए पीने के साफ पानी की व्यवस्था करना रोजमर्रा की एक बड़ी जंग बन चुका है। शासन द्वारा ‘नल-जल योजना’ और ‘हर घर जल’ जैसे महत्वाकांक्षी अभियान चलाए जाने के बावजूद, इस ग्राम पंचायत में पेयजल व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है। यद्यपि पानी की किल्लत साल भर बनी रहती है, लेकिन भीषण गर्मी के दिनों में स्थिति अत्यंत विकराल रूप धारण कर लेती है। जलस्तर नीचे गिर जाने के कारण गांव के अधिकांश हैंडपंप और कुएं सूख जाते हैं या गंदा पानी उगलने लगते हैं। गांव की महिलाओं और बच्चों को सिर पर बर्तन रखकर या साइकिलों पर कूपों व दूर स्थित खेतों से पानी ढोकर लाना पड़ता है। रोजाना घंटों समय केवल पीने का पानी जुटाने में ही नष्ट हो जाता है, जिससे महिलाओं की दिनचर्या और बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित होती है। शुद्ध पेयजल का कोई स्थायी व भरोसेमंद जरिया न होने के कारण ग्रामीण कई बार दूषित जल पीने को मजबूर होते हैं, जिससे पेट की गंभीर बीमारियां और जल-जनित रोग पनप रहे हैं।
स्वच्छता और साफ-सफाई का ढोल खोखले साबित हो रहे दावे
‘स्वच्छ भारत अभियान’ के तहत भले ही कागजों पर पंचायतों को ओडीएफ (खुले में शौच मुक्त) और स्वच्छ घोषित कर दिया जाता हो, परंतु बुधनवारा में स्वच्छता व्यवस्था का बुरा हाल है। गांव की गलियों में नियमित रूप से झाड़ू लगाने और कचरा उठाने के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। जगह-जगह कचरे के अंबार लगे देखे जा सकते हैं। समय पर कचरा न उठाए जाने से उसमें से उठने वाली तीव्र दुर्गंध से स्थानीय निवासियों का जीना मुहाल हो गया है। आवारा पशु इन कचरे के ढेरों पर जमा होते हैं, जिससे गंदगी और अधिक फैलती है। स्वच्छता के इस अभाव ने पूरे गांव के पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है।
योजनाओं का क्रियान्वयन कागजों तक सीमित ग्रामीणों में भारी आक्रोश
ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि शासन द्वारा ग्रामीण विकास के नाम पर हर साल लाखों-करोड़ों रुपये का बजट स्वीकृत किया जाता है, लेकिन भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही के कारण यह राशि धरातल पर दिखाई नहीं देती। ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने गांव की इन विकट समस्याओं को लेकर कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों, सरपंच, सचिव से लेकर जनपद एवं जिला स्तरीय अधिकारियों तक लिखित आवेदन दिए हैं। जनप्रतिनिधि चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करके वोट ले लेते हैं, लेकिन जीतने के बाद गांव की तरफ मुड़कर भी नहीं देखते। प्रशासनिक अधिकारियों के चक्कर काट-काटकर ग्रामीण थक चुके हैं। हर बार उन्हें केवल आश्वासन देकर टाल दिया जाता है, लेकिन आज तक कोई भी स्थायी समाधान नहीं निकाला गया।
✍️ पुलिसवाला न्यूज़ कटनी से संभाग ब्यूरो पारस गुप्ता की रिपोर्ट
