वनांचल की बेटियों के सपनों को मिली नई उड़ान, गरियाबंद में 127 और छुरा में 136 परीक्षार्थियों ने दी 10वीं ओपन परीक्षा
गरियाबंद। परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि हौसले बुलंद हों तो उम्र, जिम्मेदारियां और अभाव भी शिक्षा की राह नहीं रोक सकते। गरियाबंद जिले के ग्रामीण एवं वनांचल क्षेत्रों में ऐसी ही प्रेरणादायक तस्वीर देखने को मिली, जहां कई महिलाएं अपने नवजात शिशुओं को साथ लेकर 10वीं ओपन परीक्षा देने परीक्षा केंद्र पहुंचीं। मातृत्व की जिम्मेदारी के साथ अपने अधूरे शैक्षणिक सपनों को पूरा करने का यह जज्बा महिला सशक्तिकरण की मिसाल बन गया।
ग्रामीण एवं वनांचल क्षेत्र की उन किशोरियों और महिलाओं को दोबारा शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से Agrocrats Society for Rural Development द्वारा Educate Girls के सहयोग से विशेष अभियान चलाया जा रहा है। इसके अंतर्गत गरियाबंद एवं छुरा ब्लॉक के 29 गांवों में 14 से 29 वर्ष आयु वर्ग की बालिकाओं एवं महिलाओं को ओपन स्कूल के माध्यम से कक्षा 10वीं की परीक्षा की तैयारी कराई गई।
इसी अभियान के तहत गरियाबंद में 127 तथा छुरा में 136 परीक्षार्थियों ने 10वीं ओपन परीक्षा में भाग लिया। गांवों में लर्निंग क्लास, शैक्षणिक मार्गदर्शन, मेंटरशिप एवं निरंतर सहयोग के माध्यम से पढ़ाई बीच में छोड़ चुकी महिलाओं और बेटियों को फिर से शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया गया।

नवजात को गोद में लेकर पहुंचीं परीक्षा केंद्र—बनीं प्रेरणा
इस अभियान के दौरान सबसे भावुक और प्रेरणादायक दृश्य उस समय देखने को मिला, जब कुछ माताएं अपने नवजात शिशुओं को गोद में लेकर परीक्षा केंद्र पहुंचीं। एक ओर बच्चे की जिम्मेदारी और दूसरी ओर वर्षों से अधूरे पड़े शिक्षा के सपने को पूरा करने की चाह—इन महिलाओं ने साबित कर दिया कि सच्ची लगन के सामने परिस्थितियां भी छोटी पड़ जाती हैं।
सफल अभियान में नेहा वर्मा और कविता साहू की अहम भूमिका
इस अभियान को धरातल पर सफल बनाने में नेहा वर्मा एवं प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर श्रीमती कविता साहू के विशेष प्रयास और निरंतर मार्गदर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके प्रयासों से ग्रामीण क्षेत्र की अनेक बेटियों एवं महिलाओं में शिक्षा के प्रति नई उम्मीद, आत्मविश्वास और आगे बढ़ने का जज्बा पैदा हुआ।
यह पहल केवल 10वीं की परीक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि उन महिलाओं और बेटियों के अधूरे सपनों को फिर से पंख देने की कोशिश है, जिन्हें कभी सामाजिक, आर्थिक या पारिवारिक परिस्थितियों के कारण अपनी पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी थी।
गांव की चौखट से परीक्षा केंद्र तक पहुंची ये बेटियां और माताएं आज एक मजबूत संदेश दे रही हैं—
“सपने देखने की कोई उम्र नहीं होती और उन्हें पूरा करने की राह में कोई परिस्थिति बड़ी नहीं होती।”
रिपोर्ट: नेहरू साहू
जिला ब्यूरो | पुलिस वाला न्यूज, गरियाबंद








