आरंग :- नीट-2026 परीक्षा को लेकर उत्पन्न अनिश्चितता और रद्दीकरण संबंधी आशंकाओं ने लाखों विद्यार्थियों और अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। इस पर अपने विचार साझा करते हुवे महात्मा गांधी शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय रीवां वि.खं. आरंग जिला रायपुर के रसायन विषय के व्याख्याता डॉ. बेद लाल ने चिंता व्यक्त करते हुवे कहा कि प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल चयन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य, परिश्रम और विश्वास का आधार होती हैं। यदि परीक्षा-प्रणाली पर बार-बार सवाल उठते हैं, तो इसका सबसे बड़ा असर ईमानदारी से तैयारी करने वाले छात्रों पर पड़ता है। ऐसी स्थिति में प्रशासन की जिम्मेदारी केवल परीक्षा आयोजित करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पारदर्शिता, समयबद्ध सूचना और निष्पक्षता सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक हो जाता है।
भारत की प्रतियोगी परीक्षा-व्यवस्था केवल प्रवेश की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, अवसर और प्रतिभा-परीक्षण का आधार है। जब राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा यानी नीट जैसी राष्ट्रीय परीक्षा को लेकर अनियमितता, संदिग्धता या रद्दीकरण की स्थिति बनती है, तो केवल एक परीक्षा प्रभावित नहीं होती, बल्कि लाखों विद्यार्थियों का भरोसा, समय और मानसिक संतुलन भी टूटता है। परीक्षा किसी तकनीकी आयोजन भर का नाम नहीं है। यह उस भरोसे का प्रतीक है जिसमें राज्य यह सुनिश्चित करता है कि परिश्रम, योग्यता और तैयारी का उचित मूल्य मिलेगा।
नीट जैसे मामलों में सबसे चिंताजनक तथ्य केवल यह नहीं कि कोई एक घटना घट गई, बल्कि यह है कि ऐसी घटनाएँ बार-बार क्यों सामने आती हैं। जब कोई राष्ट्रीय परीक्षा संदेह के घेरे में आती है, तो पूरा सार्वजनिक विश्वास डगमगाने लगता है। विद्यार्थी, अभिभावक, शिक्षक, कोचिंग संस्थान और प्रशासन सभी जूझते हैं।
परीक्षा-व्यवस्था का संकट अचानक पैदा नहीं होता। यह उन छोटी-छोटी कमजोरियों से बनता है जिन्हें समय रहते ठीक नहीं किया जाता। प्रश्नपत्र निर्माण की प्रक्रिया, गोपनीय सामग्री का संरक्षण, लॉजिस्टिक ट्रांसपोर्ट, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, तकनीकी सत्यापन, पहचान-प्रक्रिया और उत्तर-पत्रों की हैंडलिंग—इन सभी स्तरों पर यदि एक भी कड़ी कमजोर हो जाए, तो पूरी व्यवस्था संदेह के घेरे में आ सकती है। आधुनिक समय में परीक्षा केवल कागज और कलम का आयोजन नहीं रह गई है। वह सूचना, सुरक्षा और नियंत्रण के अत्यंत जटिल नेटवर्क से जुड़ी प्रणाली बन चुकी है।
इसलिए किसी भी स्तर पर हुई लापरवाही का सीधा प्रभाव छात्रों के भविष्य पर पड़ता है। यह भी समझना होगा कि परीक्षा-प्रणाली में भरोसा केवल पारदर्शिता से नहीं बनता, बल्कि निरंतरता से बनता है। यदि विद्यार्थी को यह आश्वासन न हो कि उसकी मेहनत का मूल्य स्थिर और सुरक्षित है, तो उसकी तैयारी अनिश्चितता में बदल जाती है।
एक ईमानदार छात्र परीक्षा केंद्र तक पहुँचने से पहले ही मन में कई प्रश्न लेकर आता है।
शिक्षा का मूल उद्देश्य अवसर की समानता है, और यदि वही कमजोर पड़ जाए, तो व्यवस्था अपने उद्देश्य से भटक जाती है।
राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा जैसी परीक्षा में यह चिंता और अधिक गंभीर हो जाती है, क्योंकि यह केवल एक पेशेवर प्रवेश-परीक्षा नहीं, बल्कि लाखों परिवारों के सामाजिक-आर्थिक सपनों का केंद्र है। ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र, निम्न-मध्यम वर्ग के अभ्यर्थी और छोटे शहरों के युवा सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी योग्यता के बल पर आगे बढ़ने का सपना देखते हैं। लेकिन जब परीक्षा की शुचिता पर प्रश्न उठते हैं, तब सबसे अधिक नुकसान इन्हीं विद्यार्थियों का होता है। जिनके पास प्रभाव, संसाधन या नेटवर्क है, वे कई बार व्यवस्था की कमजोरियों से निकल जाते हैं।
पर जिनके पास केवल मेहनत है, वे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इसलिए परीक्षा की पारदर्शिता केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है।
परीक्षा-व्यवस्था का संकट विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डालता है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पहले ही अत्यधिक तनावपूर्ण होती है। छात्र लंबे समय तक कठोर अनुशासन, सीमित सामाजिक जीवन, पारिवारिक अपेक्षाओं और भविष्य की अनिश्चितता के बीच रहते हैं। जब ऐसी स्थिति में परीक्षा का भविष्य ही संदिग्ध हो जाए, तो मानसिक दबाव कई गुना बढ़ जाता है। कुछ विद्यार्थी हताश हो जाते हैं, कुछ अपनी रणनीति बार-बार बदलते हैं, और कुछ गहरे अवसाद में भी चले जाते हैं।
इसलिए परीक्षा-प्रशासन को यह समझना चाहिए कि वह केवल तिथियाँ घोषित करने या केंद्र स्थापित करने का काम नहीं कर रहा, बल्कि युवाओं के भविष्य का भरोसा संभाल रहा है।
डिजिटल युग ने परीक्षा-प्रशासन को सुविधाएँ भी दी हैं और नई चुनौतियाँ भी।
ऑनलाइन पंजीकरण, डिजिटल पहचान, सीसीटीवी निगरानी, एन्क्रिप्टेड डेटा और केंद्रीकृत नियंत्रण जैसी व्यवस्थाओं ने परीक्षा प्रणाली को आधुनिक बनाया है।
लेकिन इसी के साथ तकनीकी जोखिम भी बढ़े हैं। डेटा लीक, सॉफ्टवेयर में छेड़छाड़, आंतरिक मिलीभगत, साइबर घुसपैठ और गलत सूचना का प्रसार—ये सभी नई चुनौतियाँ बनकर सामने आए हैं। इसलिए उसकी सुरक्षा, ऑडिट और जवाबदेही भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। यदि तकनीक ही कमजोर हो जाए, तो पारदर्शिता का दावा खोखला साबित होगा।
परीक्षा-व्यवस्था में सुधार के लिए सबसे पहले जवाबदेही तय करनी होगी। जब कोई परीक्षा विवाद में आती है, तो अक्सर ध्यान केवल घटना पर केंद्रित रहता है। लेकिन असली प्रश्न यह है कि उस घटना की अनुमति किसकी लापरवाही से मिली। परीक्षा-आयोजक संस्था, संबंधित मंत्रालय, सुरक्षा एजेंसियाँ, केंद्र-स्तरीय अधिकारी और स्थानीय प्रशासन—सभी की भूमिका की समीक्षा आवश्यक है। जवाबदेही का अर्थ केवल किसी एक अधिकारी को हटाना नहीं, बल्कि पूरे ढाँचे का पुनर्मूल्यांकन करना है। यदि दोषी पकड़े नहीं जाते, प्रक्रिया की कमियाँ सार्वजनिक नहीं होतीं और सुधारात्मक कदम नहीं उठाए जाते, तो हर बार वही संकट दोहराया जाएगा।
दूसरी आवश्यकता स्वतंत्र और समयबद्ध ऑडिट की है। प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परीक्षा-समापन तक हर चरण का सुरक्षित रिकॉर्ड होना चाहिए। किसी भी संदिग्ध गतिविधि की स्थिति में तत्काल जांच संभव हो, इसके लिए ऐसा तंत्र चाहिए जो पारदर्शी भी हो और तेज भी। साथ ही परीक्षा-प्रबंधन में बहुस्तरीय निगरानी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जहाँ कोई एक व्यक्ति या विभाग पूरी प्रक्रिया पर एकाधिकार न रखे। नियंत्रण का विकेंद्रीकरण और निगरानी का केंद्रीकरण—यही संतुलन सुरक्षित परीक्षा-तंत्र की आधारशिला बन सकता है।
तीसरी आवश्यकता विश्वसनीय संवाद व्यवस्था की है। सोशल मीडिया के दौर में अफवाहें बहुत तेजी से फैलती हैं। ऐसे में संस्थाओं को केवल सही सूचना ही नहीं, बल्कि समय पर सूचना भी देनी चाहिए। अस्पष्टता संदेह को जन्म देती है। यदि छात्रों को यह स्पष्ट न हो कि अगला कदम क्या होगा, परिणाम कब आएगा, या पुनर्परीक्षा होगी या नहीं, तो वे अनावश्यक तनाव में घिर जाते हैं। इसलिए परीक्षा-प्रशासन को अपने संवाद को औपचारिकता से निकालकर भरोसेमंद सार्वजनिक सेवा में बदलना होगा।
चौथी और सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता कठोर और निश्चित दंड व्यवस्था की है। प्रश्नपत्र लीक, जालसाजी, सेंधमारी या आंतरिक सहयोग जैसी अनियमितताओं पर केवल नैतिक निंदा पर्याप्त नहीं है। जब तक अपराधियों को त्वरित और निश्चित दंड नहीं मिलेगा, तब तक व्यवस्था में सुधार अधूरा रहेगा। शिक्षा-क्षेत्र में दंड का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, बल्कि निवारण होना चाहिए। व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि अनियमितता करने वाला यह समझ सके कि उसे लाभ नहीं, बल्कि त्वरित क्षति मिलेगी। तभी ईमानदार विद्यार्थी को यह भरोसा मिलेगा कि उसकी मेहनत सुरक्षित है।
भारत को अब ऐसी परीक्षा-संस्कृति की आवश्यकता है जिसमें छात्र को शक नहीं, सुरक्षा का अनुभव हो , जिसमें प्रशासन केवल आदेश देने वाला नहीं, बल्कि उत्तरदायी संरक्षक बने और जिसमें पारदर्शिता केवल शब्दों में नहीं, बल्कि हर प्रक्रिया में दिखाई दे।
यही वह मार्ग है जिससे शिक्षा-व्यवस्था पर लौटता विश्वास संभव हो सकता है। यदि सुधार अभी नहीं किए गए, तो हर नई परीक्षा पुराने संदेहों की पुनरावृत्ति बनती रहेगी। और जब भरोसा बार-बार टूटता है, तो केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि एक पीढ़ी का आत्मविश्वास भी आहत होता है।
इसलिए नीट संकट को केवल एक घटना मानकर भूल जाना समाधान नहीं होगा। इसे एक चेतावनी की तरह समझना होगा। यह चेतावनी है कि यदि परीक्षा-व्यवस्था को तकनीकी चमक, औपचारिक घोषणाओं और तात्कालिक प्रतिक्रियाओं के भरोसे छोड़ दिया गया, तो भविष्य में संकट और गहरे होंगे। अब समय आ गया है कि परीक्षा-व्यवस्था को केवल नियंत्रण का नहीं, बल्कि न्याय, विश्वास और जवाबदेही का संस्थान बनाया जाए। यही सुधार आने वाली पीढ़ियों के लिए आवश्यक है और वर्तमान विद्यार्थियों के प्रति राज्य की नैतिक जिम्मेदारी बनती है।
क्या नीट परीक्षा दोबारा कराने से समस्या हल हो जायेगी?
पहली दृष्टि में पुनर्परीक्षा एक न्यायसंगत कदम प्रतीत होता है। जिन छात्रों ने ईमानदारी से मेहनत की और परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी के कारण स्वयं को ठगा हुआ महसूस किया, उनके लिए दोबारा परीक्षा एक अवसर बन सकती है।

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