गिरेबां खाकी की पकड़ना,
अब आम हो गया।
पुलिस को आंख दिखाना,
बहादुरी का काम हो गया।
बजती है तालियां
वर्दी फाड़े जाने पर,
शाबाशी संदेशों का
सिलसिला खुलेआम हो गया।
आवाम का मुखौटा पहन
करते हैं जो फसाद।
पुलिस ने रोका, तो
बर्बरता का नाम हो गया।
क्या वीडियो क्लिप ही
सच्चाई का पैमाना है?
जो सच न दिख सका,
झूठा इल्जाम हो गया।
कई पनाहगार हैं,
गुनेहगारों के।
कानून का साथ देना
जैसे हराम हो गया।
नहीं देखता जमाना,
इसकी कामयाबियां।
रेप हत्याओं पर खाकी का
इंतकाम,गुमनाम हो गया।
जिनकी हिफाजत के लिए
जागती है ,खाकी रात भर।
उठते ही शिकवा खाकी का
उनका काम हो गया।।
हर सख्श है खिलाफ,
इसकी सख्ती के लहजे से।
जो प्यार से बोला,तो
बहरा हर इंसान हो गया।
अदालतें करती है मुलजिमों
की रिहाई पर फैसला।
रिश्वत लेकर छोड़ा,
पुलिस का नाम हो गया।
दौलत तुम्हारी,मयखाने तुम्हारे।
सवारी तुम्हारी, ठिकाने तुम्हारे।
फिर क्यूं सड़क हादसे में,
सारा ठीकरा खाकी के नाम हो गया।
दिखाता है खौफ,सियासी
प्यादा वर्दी उतरवाने का,
सियासी इशारों पर सस्पेंशन का,
जब से विधान हो गया।
कारवां जारी है, कफन ए तिरंगा। ,पुलिस जवानों का।
बस,फौजियों के मुकाबले
पुलिस का गुम बलिदान हो गया।
लेखक राजेंद्र मिश्रा
जितेंद्र मिश्रा कटनी
