37.19 लाख के पांच निर्माण कार्यों पर सवाल, भाजपा पार्षद खेमसिंह बघेल ने खोली पालिका प्रशासन की कार्यप्रणाली की पोल?

कलेक्टर जनदर्शन में शिकायत से मचा हड़कंप, जांच के आदेश; अब निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और ठेकेदारों की जवाबदेही पर टिकी निगाहें

गरियाबंद। नगर पालिका परिषद गरियाबंद में विकास कार्यों की गुणवत्ता और प्रशासनिक निगरानी को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। खास बात यह है कि सवाल विपक्ष नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ भाजपा के ही पार्षद ने उठाए हैं। वार्ड क्रमांक 08 के भाजपा पार्षद खेमसिंह बघेल ने अपनी ही पार्टी के नेतृत्व वाली नगर पालिका में वार्ड क्रमांक 3, 5 और 7 में कराए गए पांच सड़क एवं नाली निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कलेक्टर जनदर्शन में शिकायत दर्ज कराई है। इन निर्माण कार्यों की कुल लागत करीब 37.19 लाख रुपये बताई गई है।

शिकायत के बाद कलेक्टर रणबीर शर्मा द्वारा जांच के आदेश दिए जाने से मामला और गंभीर हो गया है। अब निगाहें जांच की निष्पक्षता, निर्माण कार्यों के तकनीकी मूल्यांकन और सरकारी राशि के उपयोग पर टिकी हैं। सवाल यह भी है कि जब नगर पालिका में भाजपा का बहुमत है और अध्यक्ष पद पर भाजपा समर्थित रिखीराम यादव काबिज हैं, तब आखिर उसी दल के पार्षद को निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए कलेक्टर की चौखट तक क्यों पहुंचना पड़ा?

अपनी ही नगर सरकार पर सवाल, पालिका प्रशासन की निगरानी व्यवस्था कठघरे में

भाजपा पार्षद खेमसिंह बघेल की शिकायत ने नगर पालिका की कार्यप्रणाली को लेकर नई बहस छेड़ दी है। निर्माण कार्यों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, निर्धारित मापदंडों का पालन कराना, तकनीकी निरीक्षण करना और भुगतान से पहले कार्यों की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन करना संबंधित निकाय की जिम्मेदारी होती है।

ऐसे में करीब 37.19 लाख रुपये के पांच निर्माण कार्यों को लेकर शिकायत सामने आना पालिका प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। हालांकि, निर्माण कार्यों में अनियमितता की वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही स्पष्ट होगी, लेकिन सत्ता पक्ष के पार्षद की शिकायत ने प्रशासनिक जवाबदेही का मुद्दा जरूर उठा दिया है।

अध्यक्ष रिखीराम यादव की कार्यप्रणाली पर भी उठे सवाल

नगर पालिका में भाजपा समर्थित अध्यक्ष रिखीराम यादव के नेतृत्व में संचालित परिषद की कार्यप्रणाली भी अब चर्चा के केंद्र में है। पार्षद की शिकायत के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की निगरानी किस स्तर पर की गई और संबंधित अधिकारियों ने कार्यों के मूल्यांकन में किन तकनीकी मानकों का पालन किया।

क्या निर्माण कार्यों की नियमित निगरानी की गई थी? क्या ठेकेदारों को भुगतान से पहले कार्यों की गुणवत्ता और निर्धारित मापदंडों के अनुरूप निर्माण की पुष्टि की गई? यदि सब कुछ नियमानुसार हुआ है, तो जांच में इसकी पुष्टि होनी चाहिए। वहीं, यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता सामने आती है, तो जिम्मेदारों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

फिलहाल, पार्षद की शिकायत के आधार पर अध्यक्ष या पालिका प्रशासन को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। जांच के निष्कर्ष ही यह स्पष्ट करेंगे कि खामियां कहां और किस स्तर पर हुईं।

ठेकेदारों पर भी रहेगी जांच की नजर, गुणवत्ता से समझौता हुआ तो तय हो जवाबदेही

सड़क और नाली निर्माण जैसे बुनियादी विकास कार्यों में ठेकेदारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। निर्माण में इस्तेमाल सामग्री की गुणवत्ता, निर्धारित मापदंडों का पालन, कार्य की वास्तविक लंबाई-चौड़ाई, मोटाई, स्वीकृत प्राक्कलन और भुगतान से जुड़े दस्तावेज जांच के प्रमुख आधार होने चाहिए।

यदि जांच में निर्माण कार्यों में निर्धारित मानकों के उल्लंघन, घटिया सामग्री के इस्तेमाल, माप में अंतर अथवा भुगतान संबंधी अनियमितता की पुष्टि होती है, तो संबंधित ठेकेदारों और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

सरकारी धन जनता की अमानत है। इसलिए निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को केवल कागजी रिकॉर्ड तक सीमित रखने के बजाय मौके पर तकनीकी परीक्षण के माध्यम से परखा जाना जरूरी है। शिकायत में शामिल सभी पांच कार्यों का स्वतंत्र और निष्पक्ष मूल्यांकन होने से ही वास्तविक स्थिति सामने आ सकेगी।

कलेक्टर के जांच आदेश से बढ़ी उम्मीदें, अब कार्रवाई के परिणाम का इंतजार

कलेक्टर रणबीर शर्मा द्वारा जांच के आदेश दिए जाने के बाद अब प्रशासनिक कार्रवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं। जांच में निर्माण कार्यों की वास्तविक स्थिति, तकनीकी गुणवत्ता, स्वीकृत राशि, माप पुस्तिका, मूल्यांकन और भुगतान संबंधी अभिलेखों का परीक्षण महत्वपूर्ण होगा।

नगर पालिका प्रशासन और संबंधित ठेकेदारों का पक्ष भी सामने आना चाहिए, ताकि जांच सभी तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष तरीके से पूरी हो सके। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, आरोप प्रमाणित नहीं होने पर तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल—विकास कार्यों की निगरानी कौन कर रहा है?

गरियाबंद नगर पालिका में सामने आया यह मामला केवल पांच सड़क एवं नाली निर्माण कार्यों तक सीमित नहीं है। यह नगर के विकास कार्यों की गुणवत्ता, सार्वजनिक धन के उपयोग और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही से भी जुड़ा है।

जब सत्तारूढ़ दल का ही पार्षद निर्माण कार्यों पर सवाल उठाकर कलेक्टर जनदर्शन में शिकायत करता है, तो पालिका प्रशासन की निगरानी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब देखना होगा कि जांच में 37.19 लाख रुपये के इन पांच निर्माण कार्यों की वास्तविक स्थिति क्या सामने आती है और यदि कोई अनियमितता प्रमाणित होती है, तो संबंधित ठेकेदारों, अधिकारियों अथवा अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की जाती है।

फिलहाल गरियाबंद नगर पालिका में सवाल बड़ा है—निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की जवाबदेही आखिर किसकी है? इसका ठोस जवाब अब निष्पक्ष जांच और उसके परिणामों से ही मिलेगा।

रिपोर्ट नेहरू साहू जिला ब्यूरो गरियाबंद

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