शहडोल।-जिला मुख्यालय में कानून व्यवस्था और यातायात नियमों को ठेंगा दिखाते हुए रेत माफियाओं के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि उन्हें अब न तो पुलिस का खौफ है और न ही प्रशासन का। शहर के सबसे व्यस्ततम और संवेदनशील इलाकों में शुमार पुराना गांधी चौक पर प्रतिबंधित समय (नो-एंट्री) में भारी-भरकम गाड़ियां घुस रही हैं और खुलेआम रेत बेची जा रही है।
सबसे बड़ा और प्रश्न यह है कि जब पूरे शहडोल जिले में रेत का कोई वैध ठेका ही नहीं है, तो आखिर यह रेत आ कहाँ से रही है?
चौराहों पर पहरा सिर्फ दिखावा? सिटी पुलिस और ट्रैफ़िक विभाग पर उठे सवाल
शहर के हर प्रमुख चौराहे पर ट्रैफ़िक पुलिस की मुस्तैदी के दावे किए जाते हैं। जगह-जगह पुलिस का पहरा होता है, चालानी कार्रवाई के नाम पर आम जनता को परेशान किया जाता है, लेकिन रेत से लदे इन विशालकाय वाहनों पर किसी की नजर नहीं पड़ती।
पुलिस की नाकामी
शहर की सुरक्षा और अवैध गतिविधियों पर नजर रखने की जिम्मेदारी पुलिस की है। मुख्य बाजार और गांधी चौक जैसे व्यस्त इलाके में अवैध रेत से लदे वाहन आकर खड़े हो जाते हैं और घंटों कारोबार चलता रहता है, लेकिन पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगती। क्या यह पुलिस की घोर लापरवाही है या फिर माफियाओं को मूक संरक्षण?
ट्रैफ़िक पुलिस का ‘धृतराष्ट्र’ अवतार
नो-एंट्री के समय भारी वाहनों का शहर में प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित होता है। इसके बावजूद गांधी चौक जैसे व्यस्ततम मार्ग पर रेत से लदी गाड़ी का पहुंचना ट्रैफ़िक पुलिस की कार्यप्रणाली पर गहरा दाग लगाता है। आम दुपहिया वाहनों को नियम सिखाने वाली ट्रैफ़िक पुलिस इन रेत माफियाओं के सामने नतमस्तक क्यों नजर आ रही है?
आखिर कहाँ से आ रही है रेत?
जब जिले में रेत उत्खनन का कोई ठेका ही नहीं है, तो साफ है कि यह पूरी रेत अवैध रूप से नदियों का सीना चीरकर निकाली जा रही है। रात के अंधेरे में होने वाला यह काला कारोबार अब दिन के उजाले में शहर के बीचों-बीच पहुंच चुका है। पुलिस की इस कथित ‘लापरवाही’ के कारण न सिर्फ शासन को करोड़ों रुपये के राजस्व का चूना लग रहा है, बल्कि व्यस्ततम मार्गों पर दुर्घटनाओं का खतरा भी कई गुना बढ़ गया है।
बड़ा सवाल: क्या पुलिस प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है? या फिर रेत माफियाओं के रसूख के आगे पुलिस विभाग ने पूरी तरह घुटने टेक दिए हैं? जनता अब इस खुलेआम चल रहे खेल पर पुलिस कप्तान से सख्त कार्रवाई की उम्मीद कर रही है।
अजय पाल
