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Home - क्षेत्रीय खबर - रामनवमी – सर्वशक्तिशाली होते हुए भी मर्यादा पुरूषोत्तम हैं श्रीराम 
क्षेत्रीय खबर

रामनवमी – सर्वशक्तिशाली होते हुए भी मर्यादा पुरूषोत्तम हैं श्रीराम 

PolicewalaBy PolicewalaMarch 26, 2026No Comments3 Views
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रामनवमी – सर्वशक्तिशाली होते हुए भी मर्यादा पुरूषोत्तम हैं श्रीराम 

 

भोपाल – श्रीराम का जन्म अयोध्या में हुआ था लेकिन ये भी अटल सत्य है कि श्री राम तो कण-कण में हैं, हर सनातनी के मन में हैं। श्री राम के जीवन और उनके आदर्शों को शब्दों में पिरोना असंभव है। श्रीराम के जीवन आदर्श, उनकी मर्यादा, उनके प्रेम, उनके धैर्य, उनके पराक्रम, उनके आचरण को किसी मजहबी और किसी भौगोलिक सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। सनातन धर्म में श्रीराम को भगवान विष्णु का सातवां अवतार माना जाता है। मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम को आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श भाई के रूप में जाना जाता है। श्री राम तो वो थे जिन्होंने पिता के आदेश का पालन करते हुए चैदह साल का वनवास भोगा, श्री राम वो थे जिन्होंने रावण का वध कर असुरों से लोगों की रक्षा की, जिन्होंने शबरी के झूठे बेर खाए, जिन्होंने अहिल्या का उद्धार किया। प्रभु श्रीराम सर्वशक्तिशाली होते हुए भी मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। यही वो वजह है कि जय सियाराम का संबोधन खासों आम की जुबान पर रहता है। जय सियाराम का संबोधन मन को सुकुन देने वाला होता है। श्री राम, भगवान विष्णु के 7वें अवतार हैं। जो श्री कृष्ण, परशुराम सहित उनके सबसे लोकप्रिय अवतारों में से एक हैं। श्री राम का उल्लेख जैन ग्रंथों में भी 63 शालकपुरुषों में 8वें बलभद्र के रूप में किया गया है। श्री राम को सिख धर्म मेंदशम ग्रंथ में चैबीस अवतार में विष्णु के चैबीस दिव्य अवतारों में से एक के रूप में वर्णित किया गया है।

राम नवमी का पावन पर्व हमारे लिए उत्साह, उल्लास, अपार खुशियों के साथ ही ये संदेश लेकर भी आता है कि हम प्रभु श्रीराम के आदर्शों को अपनाएं। भगवान राम के आदर्शों को अपनाने वाला इंसान जीवन की हर बाधा को पार करने में सक्षम हो जाता है। वह कठिन से कठिन परिस्थितियों को आसानी से निपटने में माहिर हो जाता है। राम नवमी भगवान विष्णु के सातवें अवतार, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जन्म का उत्सव है। भगवान राम धर्म, सत्य, कर्तव्य, संयम, दया और नैतिकता के प्रतीक हैं और उनके जीवन का हर कार्य मानवता के लिए आदर्श स्थापित करता है। राम नवमी आत्मनिरीक्षण और आध्यात्मिक जागृति का अवसर भी है। राम नवमी सिर्फ भगवान श्रीराम के जन्म का उत्सव ही नहीं, बल्कि उनकी आदर्श जीवनशैली का भी अनुसरण करने और आत्मसात करने का अवसर है। श्रीराम ने हमेशा धर्म का पालन किया और कभी अन्याय का साथ नहीं दिया। प्रभु श्री राम से सीख लेनी चाहिए कि आखिर कैसे उन्होंने 14 वर्षों तक वनवास में रहकर संयम के साथ कार्य किया था। उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन में ऐसे ही संयम और धैर्य से काम करना चाहिए। श्रीराम ने अपने जीवन में ज्ञान हासिल करने को भी महत्व दिया। रावण के अंत समय में उन्होंने अपने अनुज लक्ष्मण को रावण के पास ज्ञान हासिल करने के लिए भेजा। इसी तरह हमें भी ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। भगवान श्री राम ने अपने से बड़े हों या छोटे सभी से प्रेम भाव रखने, मित्रता निभाने की सीख भी दी। उन्होंने जरूरत पड़ने पर लोगों की मदद करने, हमेशा भलाई और धर्म के रास्ते पर चलने की भी सीख दी। रामजी से दयाभाव रखने, क्षमा करने, कर्तव्य निभाने की भी सीख मिलती है। श्री राम ने पिता दशरथ व माता कैकेयी के द्वारा 14 वर्ष का वनवास दिए जाने पर माता-पिता की आज्ञा का पालन किया। प्रभु श्री राम को मर्यादा पुरूषोत्तम कहा जाता है। हमें प्रभु श्री राम के आचरण से मर्यादित रहकर जीवन व्यतीत करने की शिक्षा मिलती है। प्रभु श्री राम जी ने सदैव अपने गुरु वशिष्ट की आज्ञा का पालन किया है। उनके चरित्र से हमें गुरू भक्ति सीखनी चाहिए। भगवान राम ने किसी भी मुश्किल परिस्थिति में अपना धैर्य नहीं खोया। भगवान राम ने हर परेशानी में धैर्य से काम लिया है इसलिए हमें प्रभु श्री राम जी तरह जीवन की हर कठिन परिस्थिति में शांति से काम करना चाहिए।

रामनवमी का त्यौहार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाया जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम जी का जन्म हुआ था।

चैत्रे नवम्यां प्राक् पक्षे दिवा पुण्ये पुनर्वसौ ।

उदये गुरुगौरांश्चोः स्वोच्चस्थे ग्रहपञ्चके ॥

मेषं पूषणि सम्प्राप्ते लग्ने कर्कटकाह्वये ।

आविरसीत्सकलया कौसल्यायां परः पुमान् ॥ (निर्णय सिन्धु)

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास ने राम नवमी के दिन ही रामचरितमानस को लिखना शुरू किया था। इसे ‘तुलसी रामायण’ या ‘तुलसीकृत रामायण’ भी कहा जाता है। रामचरितमानस को लिखने में तुलसीदासजी को 2 वर्ष 7 माह 26 दिन का समय लगा था और तुलसीदास जी ने इसे संवत् 1633 के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में राम विवाह के दिन पूर्ण किया था। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस बालकाण्ड में स्वयं लिखा है कि उन्होंने रामचरित मानस की रचना का आरम्भ अयोध्यापुरी में विक्रम सम्वत् 1631 (1574 ईस्वी) के रामनवमी (मंगलवार) को किया था। गोस्वामी जी ने रामचरितमानस में श्रीराम के जन्म का वर्णन करते हुए लिखा है..

भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।

हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥

लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।

भूषन वनमाला नयन बिसाला सोभासिन्धु खरारी॥

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।

माया गुन ग्यानातीत अमाना वेद पुरान भनंता॥

करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।

सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रकट श्रीकंता॥

हिन्दु धर्म शास्त्रों के अनुसार त्रेतायुग में रावण के अत्याचारों को समाप्त करने तथा धर्म की पुनः स्थापना के लिये भगवान विष्णु ने मृत्यु लोक में श्री राम के रूप में अवतार लिया था। श्रीराम चन्द्र जी का जन्म चैत्र शुक्ल की नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में रानी कौशल्या की कोख से, राजा दशरथ के घर में हुआ था। भगवान राम का जन्म इस दिन दोपहर के समय अभिजीत नक्षत्र में हुआ था। भगवान राम का जन्म जिस समय हुआ तब 5 ग्रह एक साथ उच्च स्थिति में थे।

रामायण के अनुसार अयोध्या के राजा दशरथ की तीन पत्नियाँ थीं लेकिन बहुत समय तक कोई भी राजा दशरथ को सन्तान का सुख नहीं दे पाई थीं जिससे राजा दशरथ बहुत परेशान रहते थे। पुत्र प्राप्ति के लिए राजा दशरथ को ऋषि वशिष्ठ ने पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराने को कहा। इसके पश्चात् राजा दशरथ ने अपने जमाई, महर्षि ऋषि श्रृंग से यज्ञ कराया। तत्पश्चात यज्ञकुण्ड से अग्निदेव अपने हाथों में खीर की कटोरी लेकर बाहर निकले। यज्ञ समाप्ति के बाद महर्षि ऋष्यश्रृंग ने दशरथ की तीनों पत्नियों को एक-एक कटोरी खीर खाने को दी। खीर खाने के कुछ महीनों बाद ही तीनों रानियाँ गर्भवती हो गयीं। ठीक 9 महीनों बाद राजा दशरथ की सबसे बड़ी रानी कौशल्या ने श्रीराम को जो भगवान विष्णु के सातवें अवतार थे, कैकयी ने श्रीभरत को और सुमित्रा ने जुड़वा बच्चों श्रीलक्ष्मण और श्रीशत्रुघ्न को जन्म दिया। मानव रूप में पूजे जाने वाले श्री राम पहले देवता हैं। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक ग्यारह हजार वर्षों तक भगवान राम ने राज किया था और यह युग राम राज्य कहलाता है। इक्ष्वाकु वंश में भगवान राम का जन्म हुआ था। पौराणिक कथा व धर्म शास्त्रों के अनुसार भगवान सूर्य के पुत्र राजा इक्ष्वाकु के द्वारा इस वंश की स्थापना की गई थी। इसी वजह से भगवान राम को सूर्यवंशी भी कहा जाता है। रघुवंशियों के गुरु ऋषि वशिष्ठ जी के द्वारा भगवान राम का नाम करण किया गया था।

रामनवमी के त्यौहार का महत्व हिंदु धर्म सभ्यता में महत्वपूर्ण रहा है। इस पर्व के साथ ही माँ दुर्गा की उपासना का पर्व चैत्र नवरात्र का समापन भी होता है। हिन्दू धर्म में रामनवमी के दिन पूजा अर्चना की जाती है। जगत के पालनहार भगवान विष्णु के सातवें अवतार प्रभु श्रीराम हैं। धार्मिक मान्यता है कि चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। इसलिए हर साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को राम नवमी का पर्व मनाया जाता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के नौवे दिन मां दुर्गा और भगवान श्री राम की पूजा का विशेष महत्व है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि भगवान राम ने लंका पर विजय हासिल करने के लिए मां दुर्गा की उपासना की थी इसलिए चैत्र नवरात्रि की नवमी तिथि पर देवी दुर्गा और भगवान राम दोनों की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान राम की मृत्यु नहीं हुई थी बल्कि वह शरीर के साथ बैकुण्ठ गए थे। ऐसा माना जाता है कि मौर्य, सिसोदिया, कुशवाहा, शाक्य, बैछला जो राजपूत वंश हैं, यह सभी भगवान राम के वंशज है। बहरहाल, राम नवमी एक ऐसा अवसर है जहां हम ना सिर्फ भगवान श्रीराम के जन्म का जश्न मनाते हैं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने करने का प्रयास भी करते हैं। आइए, हम उनके त्याग, मर्यादा, कर्तव्य, प्रेम, धर्म और सत्यनिष्ठा के मार्ग पर चलने का संकल्प लें। प्रभु श्रीराम के जन्म उत्सव पर सच्चाई, दया और भाईचारे का संदेश फैलाएं तभी रामनवमी मनाने का मकसद पूरा हो पाएगा।

 

रिपोर्ट -मुस्ताअली बोहरा

अधिवक्ता एवं लेखक

भोपाल, मप्र

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