पहले ₹71.65 लाख के विकास कार्य निरस्त, 17 दिन बाद उसी कॉलोनी के मार्ग अनुमोदन का प्रस्ताव—पालिका प्रशासन की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल
गरियाबंद। नगर पालिका परिषद गरियाबंद के वार्ड क्रमांक 15 में होटल सिटी रिजेंसी के समीप विकसित कथित अवैध कॉलोनी का मामला अब गंभीर प्रशासनिक सवालों के घेरे में आ गया है। कॉलोनी की विकास स्थिति को करीब 75 प्रतिशत विकसित बताते हुए उच्च कार्यालयों को रिपोर्ट भेजे जाने के आरोप के बाद नगर पालिका के मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कलेक्टर जनदर्शन में शिकायत प्रस्तुत की गई है।
शिकायतकर्ता जुनैद खान, वार्ड क्रमांक 15, गरियाबंद ने आरोप लगाया है कि संबंधित कॉलोनी के संबंध में वास्तविक स्थिति के विपरीत रिपोर्ट तैयार कर उच्च अधिकारियों को भेजी गई। शिकायत में कृषि भूमि पर कथित अवैध प्लाटिंग, कॉलोनाइजर एक्ट के प्रावधानों की अनदेखी तथा नियमों के उल्लंघन के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं किए जाने का आरोप लगाया गया है।
एक ही कॉलोनी पर पालिका के दो अलग-अलग रुख क्यों?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल नगर पालिका के आधिकारिक पत्राचार को लेकर खड़ा हो रहा है। दस्तावेजों के अनुसार, पालिका द्वारा इसी क्षेत्र में लगभग ₹71.65 लाख के सीसी रोड, आरसीसी ड्रेन एवं आरसीसी कलवर्ट निर्माण कार्यों को निरस्त किया गया था। लेकिन कथित तौर पर मात्र 17 दिन बाद उसी क्षेत्र के लिए नगर तथा ग्राम निवेश विभाग से मार्ग संरचना अनुमोदन का प्रस्ताव भेज दिया गया।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब पालिका के अनुसार क्षेत्र में अवैध कॉलोनी के कारण विकास कार्यों को निरस्त किया गया था, तो फिर महज 17 दिन बाद उसी क्षेत्र के मार्ग संरचना अनुमोदन की जरूरत क्यों पड़ी?
क्या इस पूरे घटनाक्रम के बीच कोई ऐसी परिस्थिति या निर्णय सामने आया, जिसके आधार पर पालिका का रुख अचानक बदल गया? यदि हां, तो उसका विधिवत आधार क्या था? और यदि नहीं, तो एक ही कॉलोनी के संबंध में अलग-अलग समय पर अलग-अलग रिपोर्ट और कार्रवाई क्यों?
75 प्रतिशत विकास का दावा भी सवालों के घेरे में
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि कॉलोनी को लगभग 75 प्रतिशत विकसित बताते हुए रिपोर्ट उच्च कार्यालयों को भेजी गई, जबकि वास्तविक भौतिक स्थिति और उपलब्ध दस्तावेजों के बीच कथित तौर पर विरोधाभास है। ऐसे में यह भी जांच का विषय बन गया है कि 75 प्रतिशत विकास का आकलन किस आधार पर, किस अधिकारी द्वारा और किन मापदंडों के आधार पर किया गया?
यदि रिपोर्ट तथ्यात्मक है तो उसके समर्थन में स्थल निरीक्षण, पंचनामा, मापदंड एवं संबंधित दस्तावेज क्या हैं? और यदि रिपोर्ट वास्तविक स्थिति से विपरीत पाई जाती है तो ऐसी रिपोर्ट उच्च कार्यालयों को भेजने की जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
CMO की भूमिका पर सीधे उठे सवाल
शिकायतकर्ता ने पालिका CMO पर पद के दुरुपयोग तथा वास्तविक तथ्यों के विपरीत मनगढ़ंत एवं भ्रामक रिपोर्ट भेजने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। साथ ही आशंका जताई गई है कि ऐसी रिपोर्ट से संबंधित कॉलोनी विकसित करने वालों को कथित रूप से लाभ पहुंच सकता है और प्रशासनिक स्तर पर वास्तविक स्थिति को प्रभावित किया जा सकता है।
हालांकि इन आरोपों की सत्यता जांच का विषय है, लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों में यदि वास्तव में विरोधाभास पाया जाता है तो यह केवल किसी एक कॉलोनी का मामला नहीं, बल्कि नगर पालिका की निर्णय प्रक्रिया, पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
अब निष्पक्ष जांच से ही खुलेगा पूरा सच
शिकायत के साथ RTI से प्राप्त नगर पालिका की जानकारी, तहसीलदार कार्यालय के दस्तावेज, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग से प्राप्त जानकारी, कलेक्टर कार्यालय का 23 फरवरी 2026 का पत्र तथा नगर एवं ग्राम निवेश विभाग रायपुर से संबंधित दस्तावेज संलग्न किए जाने की बात कही गई है।
शिकायतकर्ता ने मांग की है कि पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए, संबंधित अधिकारियों द्वारा भेजी गई रिपोर्टों की वास्तविकता की जांच हो तथा दस्तावेजों और स्थल की स्थिति का मिलान कराया जाए। आरोप सही पाए जाने पर संबंधित CMO के विरुद्ध एफआईआर एवं कठोर विभागीय कार्रवाई की मांग की गई है।
अब असली सवाल यही है—जिस कॉलोनी को लेकर पालिका के अपने रिकॉर्ड में पहले गंभीर आपत्तियां और विकास कार्यों का निरस्तीकरण दर्ज है, उसी क्षेत्र को बाद में 75 प्रतिशत विकसित बताकर मार्ग संरचना अनुमोदन की प्रक्रिया क्यों आगे बढ़ाई गई?
क्या यह महज प्रशासनिक प्रक्रिया का विरोधाभास है या इसके पीछे किसी को लाभ पहुंचाने की कोशिश? इसका जवाब निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगा।
रिपोर्ट नेहरू साहू जिला ब्यूरो गरियाबंद







