कटनी
कटनी | बहोरीबंद क्षेत्र ही नहीं, बल्कि आज संपूर्ण मध्य प्रदेश के ग्रामीण और कस्बाई अंचलों में एक नई और विकराल समस्या उत्पन्न हो गई है शासकीय एवं चरागाह भूमि पर अवैध कब्जा तथा उसके परिणामस्वरूप सड़कों पर बैठने को मजबूर बेसहारा गोवंश। गोवंश भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि और सांस्कृतिक धरोहर की रीढ़ रहा है। जिस पशु को कभी ‘गोधन’ मानकर पूजा जाता था और जिसके लिए गांवों में विशेष ‘गोचर’ (चरागाह) आरक्षित किए जाते थे, आज वही गोवंश अपने अस्तित्व और आश्रय के लिए तरस रहा है। ग्रामीण इलाकों में शासकीय और गोचर भूमि पर हुए चौतरफा अतिक्रमण ने पशुओं के प्राकृतिक आवास, चराई और पानी के स्रोतों को पूरी तरह छीन लिया है। इसके दुष्परिणाम स्वरूप मवेशी मुख्य मार्गों, चौराहों और सार्वजनिक स्थानों पर जमघट लगाने को विवश हैं। इससे न केवल गोवंश की सुरक्षा और स्वास्थ्य खतरे में है, बल्कि आए दिन होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में वाहन चालकों की जान भी जोखिम में पड़ रही है।
समस्या का मूल कारण अतिक्रमण और घटते चरागाह
गांवों में परंपरागत रूप से शासकीय भूमि का एक बड़ा हिस्सा गोवंश के स्वतंत्र विचरण और चराई के लिए ‘गोचर’ के रूप में सुरक्षित रखा जाता था। राजस्व अभिलेखों में दर्ज इस भूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण या कृषि कार्य प्रतिबंधित होता था। परंतु समय के साथ प्रशासनिक अनदेखी, स्थानीय भू-माफियाओं और बढ़ते भू-दबाव के कारण इन जमीनों पर बड़े पैमाने पर कब्जे हो गए। चरागाह की जमीनों पर कहीं पक्के मकान बना लिए गए हैं, कहीं खेती की जा रही है, तो कहीं वाणिज्यिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं। चरागाह भूमि पर अतिक्रमण होने से मवेशियों के लिए घास और चारे के प्राकृतिक स्रोत समाप्त हो गए हैं। इसके अतिरिक्त, पारंपरिक तालाब और पोखरे भी अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं, जिससे पशुओं के सामने पीने के पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। जब गोवंश के पास गांव में रुकने, चरने या विश्राम करने के लिए एक टुकड़ा जमीन भी नहीं बचती, तो वे विवश होकर खुली, सूखी और समतल जगह की तलाश में सड़कों का रुख करते हैं।
दुर्घटनाएं और गोवंश की सुरक्षा पर मंडराता खतरा
सड़कों पर गोवंश का बैठना केवल एक यातायात व्यवधान नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर मानवीय और पशु-कल्याण संबंधी आपदा का रूप ले चुका है। रात के समय या तेज रफ्तार वाहनों के सामने अचानक मवेशियों के आने से जानलेवा दुर्घटनाएं हो रही हैं। राज्य के विभिन्न राजमार्गों पर दैनिक आधार पर वाहन चालक चोटिल हो रहे हैं और अपनी जान गंवा रहे हैं ।पशुओं की दुर्दशा और अकाल मृत्यु दुर्घटनाओं में दर्जनों गोवंश रोजाना असमय मौत के मुंह में समा जाते हैं या गंभीर रूप से अपाहिज हो जाते हैं।
प्लास्टिक और जहर का खतरा
चरागाहों के अभाव में सड़कों और कचरे के ढेरों पर मुंह मारने को मजबूर पशु प्लास्टिक की पन्नियां और दूषित खाद्य पदार्थ खा रहे हैं। इससे पेट में प्लास्टिक जमा होने के कारण कई गोवंश तड़प-तड़प कर दम तोड़ देते हैं। ग्रामीणों का तर्क और प्रशासनिक उत्तरदायित्व
ग्रामीणों का यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक और व्यावहारिक है कि “यदि गांव की शासकीय एवं चरागाह भूमि अतिक्रमण की चपेट में आ जाए और पशुओं के लिए निर्धारित स्थान ही उपलब्ध न रहे, तो आखिर पशु जाएं कहां? केवल यह कह देने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता कि पशुओं को सड़क पर न बैठने दिया जाए। पशु मालिकों या समाज को कोसने से पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि उनके लिए सुरक्षित विचरण, चराई और शेल्टर की व्यवस्था हो।मामला केवल सतही तौर पर कब्जा हटाने का नहीं है।इसके लिए एक व्यवस्थित और पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रिया की आवश्यकता है
राजस्व रिकॉर्ड की पड़ताल प्रशासन को सबसे पहले राजस्व रिकॉर्ड्स (खसरा-खतौनी और गांव का नक्शा) खंगालकर यह सार्वजनिक करना चाहिए कि संबंधित गांव में कुल कितनी शासकीय और चरागाह भूमि दर्ज है। मौके पर जाकर यह भौतिक सत्यापन किया जाए कि दर्ज भूमि में से कितनी जमीन वास्तव में खाली उपलब्ध है और कितने रकबे पर अतिक्रमण हो चुका है। राजस्व विभाग की टीम द्वारा निष्पक्ष सीमांकन किया जाए ताकि अवैध कब्जाधारियों को चिन्हित किया जा सके।
कठोर बेदखली कार्रवाई कानून के नियमानुसार बेदखली के आदेश जारी कर चरागाह भूमि को पूरी तरह मुक्त कराया जाए।
सरकारी नीतियां, योजनाएं और स्वावलंबी गौशाला मॉडल मध्य प्रदेश सरकार और मध्य प्रदेश गौसंवर्धन बोर्ड द्वारा गोवंश संरक्षण के लिए कई नीतियां और योजनाएं बनाई गई हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन धरातल पर सुचारू रूप से नहीं हो पा रहा है।
मनरेगा और चरागाह विकास
मध्य प्रदेश गौसंवर्धन बोर्ड के प्रावधानों के अनुसार, केवल गौशाला का ढांचा खड़ा कर देना ही पर्याप्त नहीं है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत गौशालाओं के समीप स्थित शासकीय भूमि को चरागाह के रूप में विकसित बाउंड्रीवॉल या फेंसिंग करना।
नेपियर, स्टाइलस और अन्य पौष्टिक घासों का रोपण करना। जल संरक्षण संरचनाएं (जैसे छोटे तालाब चेक डैम) बनाना।
स्वावलंबी गौशाला नीति 2025
मध्य प्रदेश की ‘स्वावलंबी गौशाला नीति 2025’ में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें पर्याप्त शासकीय भूमि आवंटित की जाए। इस नीति का मुख्य उद्देश्य यह है कि गौशालाएं केवल चंदे या सरकारी अनुदान पर निर्भर न रहें, बल्कि उपलब्ध भूमि का उपयोग करके अपने मवेशियों के लिए स्वयं हरा चारा उगा सकें। गोबर और गौमूत्र से जैविक खाद, सीएनजी और अन्य उत्पाद बनाकर आय अर्जित कर सकें। गोवंश के लिए एक सुरक्षित, प्राकृतिक और आत्मनिर्भर इकोसिस्टम तैयार कर सकें। यह स्पष्ट है कि कागजों पर मौजूद इन प्रावधानों को जब तक धरातल पर सख्ती से लागू नहीं किया जाएगा, तब तक गोवंश का सड़क पर आना बंद नहीं होगा।

✍️*पुलिसवाला न्यूज़ कटनी से पारस गुप्ता की रिपोर्ट*

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