*30 करोड़ के मनरेगा भुगतान सहित 16वें वित्त की राशि और मानदेय के लिए तरस रहीं पंचायतें, तिरंगा चौक पर NH-130 जाम कर सरपंचों ने पूछा—काम हमारा, भुगतान के लिए कटोरा क्यों?*
गरियाबंद। गांवों में विकास का पहिया घुमाने वाले सरपंच जब अपने ही कराए गए निर्माण कार्यों की राशि के लिए हाथ में कटोरा लेकर सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाएं, तो यह पंचायत व्यवस्था की बदहाली का गंभीर सवाल बन जाता है। गरियाबंद में सोमवार को जिलेभर के सैकड़ों सरपंचों ने लंबित भुगतान के विरोध में कटोरा लेकर सांकेतिक भीख मांगते हुए भाजपा सरकार और शासन-प्रशासन के प्रति अपना आक्रोश जाहिर किया। तिरंगा चौक पर चक्काजाम कर NH-130 का आवागमन बाधित किया और पंचायतों की आर्थिक बदहाली को सड़क पर ला दिया।
सरपंच संघ के अनुसार, मनरेगा के लगभग 30 करोड़ रुपये के मजदूरी एवं सामग्री भुगतान करीब आठ महीने से लंबित हैं। वहीं 16वें वित्त आयोग, मूलभूत राशि, निर्माण कार्यों के बकाया भुगतान तथा पंचों-उपसरपंचों के मानदेय का भी इंतजार है। हैरानी यह कि कई कार्यों का मूल्यांकन और सत्यापन पूरा होने के बावजूद भुगतान की फाइलें आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। कहीं पांच-छह महीने से भुगतान अटका है, तो कहीं पंचायतें नए विकास कार्य शुरू करने की स्थिति में नहीं हैं।
*विकास के दावों पर कटोरे का करारा सवाल!*
प्रदेश में भाजपा सरकार विकास और सुशासन के बड़े-बड़े दावे कर रही है, लेकिन गरियाबंद की सड़कों पर कटोरा लेकर खड़े सरपंच उन दावों के सामने एक असहज तस्वीर पेश कर रहे हैं। आखिर यह कैसी व्यवस्था है, जहां गांवों में काम कराने वाले जनप्रतिनिधियों को अपनी ही बकाया राशि के लिए प्रदर्शन करना पड़ रहा है? क्या सरकार की विकास प्राथमिकताओं में ग्राम पंचायतों की आर्थिक मजबूती की कोई जगह नहीं है? जब काम पूरा, मूल्यांकन और सत्यापन भी पूरा, तो भुगतान की राह में रोड़ा कौन है?
सरपंचों का कहना है कि भुगतान में लगातार देरी से पंचायतों की साख प्रभावित हो रही है। निर्माण कार्य कराने वाले ठेकेदारों और सामग्री आपूर्तिकर्ताओं के सामने जवाब देना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में गांवों का विकास कैसे आगे बढ़ेगा?
*राज्योत्सव के जश्न के बीच पंचायतों की बदहाली!*
एक ओर जिला मुख्यालय में राज्योत्सव की तैयारियां और विकास के उत्सव का माहौल है, तो दूसरी ओर गांवों के विकास की जिम्मेदारी उठाने वाले सरपंच बकाया राशि के लिए कटोरा लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। यह विरोधाभास शासन-प्रशासन के लिए आत्ममंथन का विषय है। पुलिस बल की मौजूदगी में तिरंगा चौक पर हुए चक्काजाम ने साफ कर दिया कि पंचायतों का असंतोष अब ज्ञापनों और बैठकों तक सीमित नहीं रहा।
*अब सरकार जवाब दे—गांवों का विकास सिर्फ भाषणों में या बजट और भुगतान में भी?*
सरपंचों की मांग स्पष्ट है—मनरेगा के लगभग 30 करोड़ रुपये का भुगतान तत्काल किया जाए, 16वें वित्त एवं मूलभूत राशि जारी हो, लंबित निर्माण कार्यों की फाइलों का निराकरण किया जाए और पंचों-उपसरपंचों का मानदेय दिया जाए।
सवाल भाजपा सरकार की नीयत और प्रशासनिक कार्यप्रणाली दोनों पर है। आखिर पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने के दावों के बीच उन्हें आर्थिक रूप से बेबस क्यों किया जा रहा है? गांवों में विकास का श्रेय लेने की होड़ तो खूब दिखती है, लेकिन जब भुगतान की बारी आती है तो जिम्मेदारी लेने वाला कोई सामने क्यों नहीं आता?
गरियाबंद के सरपंचों का कटोरा प्रदर्शन महज विरोध नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास व्यवस्था के सामने खड़ा एक तीखा सवाल है—जब पंचायतों की जेब खाली होगी, तो गांवों में विकास की गंगा आखिर बहेगी कैसे?
*रिपोर्ट नेहरू साहू जिला ब्यूरो गरियाबंद*
