( विशेष रिपोर्ट)

भोपाल – मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार विपक्ष के निशाने पर हैं। उनके इस्तीफे की मांग को लेकर देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए और हो रहे हैं। एक खोजी रिपोर्ट के बाद विपक्षी पार्टियों और कॉकरोच जनता पार्टी ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। इस मामले में सीजेपी ने दो अक्टूबर से जेल भरो आंदोलन की चेतावनी दी है। ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली पर सवाल उठने के साथ ही लोगों को टीएन शेषन के कामकाज की यादें ताज़ा हों आईं हैं। वो शेषन ही थे जिन्होंने ये बताया कि मुख्य चुनाव आयुक्त का ओहदा कितना अहम होता है और चुनाव आयोग का असल काम क्या होता है। वरना उससे पहले तक तो सब यूं ही चलता रहता था। शेषन के बाद और डेढ़ दशक पहले तक भी आयोग के काम काज को लेकर कभी इतना विरोध नहीं हुआ। लेकिन, पिछले कुछ लोकसभा और विधानसभा चुनाव में आयोग की काम करने के तौर तरीके को लेकर संदेह कुछ ज्यादा ही गहरा गया है। कांग्रेस नेता और सांसद राहुल गांधी ने तो सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री को निशाने पर लेते हुए वोट चोरी के आरोप लगाए हैं। इधर, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई है। इसमें आरोप लगाया गया है कि वो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मंजूरी के बिना फैसले ले रहे हैं। राकेश कुमार सिंह की इस याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग की गई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस मामले को अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।

हालिया विरोध एक अखबार की खोजी रिपोर्ट सामने आने के बाद शुरू हुआ। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में आयोग की ओर से लिए गए फैसलों को लेकर 14 बार आपत्तियां जताई थीं। उनका कहना था कि इस दौरान लिए गए अहम फैसलों में भी उनसे रायशुमारी भी नहीं ली गई। हालांकि, चुनाव आयोग ने एक प्रेस नोट जारी कर कहा कि मतदाता सूची से जुड़े विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) समेत पिछले एक साल में लिए गए सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं लेकिन आयोग की ये सफाई ज्यादातर लोगों के गले नहीं उतर रही हैं।

देश भर में हो रहे प्रदर्शन

कांग्रेस शुरुआत से ही मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर वोट चोरी का आरोप लगाती आ रही है। ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर देश के कई शहरों में कांग्रेस पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के अलावा समाजवादी पार्टी, सीपीआई, सीजेपी और सिविल सोसाइटी से जुड़े लोगों ने प्रदर्शन किया। दिल्ली, पटना, श्रीनगर,जयपुर, इलाहाबाद, हैदराबाद, भोपाल, लखनउ, गुवाहाटी, हासन, पुणे, कोलकाता तक में प्रदर्शन हुए। वहीं दिल्ली के जंतर मंतर पर दो अक्तूबर को सीजेपी का प्रदर्शन है। 2 अक्तूबर को सीजेपी मुंबई स्थित शिवाजी पार्क में जेल भरो आंदोलन करेगी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने एक्स पर लिखा, मतदाता सूची से 13.30 करोड़ लोगों के नाम हटा दिए गए हैं। पश्चिम बंगाल के अनुभव को देखते हुए, अगर ये लोग ट्रिब्यूनल में अपील करते हैं, तो 91 फीसदी अपीलों को मंजूरी मिलने और उनके नाम मतदाता सूची में बहाल होने की संभावना है। कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा के अनुसार एसआईआर पूरी तरह गैरकानूनी है। फॉर्म 6 में संशोधन के लिए इसे संसद में लाना जरूरी है, लेकिन ऐसा नहीं किया गया इसलिए एसआईआर गैरकानूनी हो जाता है अगर एसआईआर गैरकानूनी है, तो नाम जोड़ने और हटाने की सभी प्रक्रियाएं भी गैरकानूनी हैं।

बीजेपी बचाव में उतरी

दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी और एनडीए के कई नेताओं ने ज्ञानेश कुमार का बचाव किया है। केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने कहा कि संवैधानिक रूप से चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संस्था है। उनके इस्तीफे की मांग करना और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाना अपने आप में लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उत्तर प्रदेश बीजेपी प्रेसीडेंट पंकज चैधरी का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों, डॉ. एसएस संधू और विवेक जोशी ने 26 सितंबर को बैठक की और प्रेस बयान जारी कर कहा कि देशभर में चल रही एसआईआर समेत सभी बड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। बीजेपी महासचिव स्मृति ईरानी ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस, नरेंद्र मोदी की छवि खराब करना चाहती है। केन्द्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी कहा था कि चुनाव आयोग को जनता का भरोसा बनाए रखना चाहिए और जो सवाल उठ रहे हैं उन पर अपनी बात रखनी चाहिए।

कांग्रेस ने की पांच मांग

हाल ही में हुई कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में ज्ञानेश कुमार को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के तीखे तेवर दिखे। उन्होंने ज्ञानेश कुमार को मोदी सरकार की कठपुतली बताया। खड़गे ने मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल पद से हटाने के साथ ही मोदी से भी नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की मांग की। खड़गे ने राजीव गांधी का प्रधानमंत्री कार्यकाल याद करते हुए बताया कि राजीव गांधी ने मतदान की उम्र 21 साल से घटाकर 18 की थी। और अब मोदी सरकार युवाओं को मताधिकार से वंचित करने की साजिश कर रही है। खड़गे ने कहा कि एसआईआर का फैसला किसने लिया, दो चुनाव आयुक्तों को इंटरनल पोर्टल से बाहर क्यों रखा गया। कांग्रेस की ओर से उन्होंने पांच मांगे रखी जिसमें मतदाता सूची में बड़े बदलावों का पूरा डेटा सार्वजनिक किया जाए, हटाए गए मतदाताओं को सूचना और अपील का मौका मिले, राजनीतिक दलों को जरूरी चुनावी डेटा सरल फार्मेट में समय पर दिया जाए, गंभीर विसंगतियों की स्वतंत्र जांच हो, चुनाव प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण डेटा और फैसलों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। बता दें कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, गुजरात, दिल्ली, केरलम, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, तेलंगाना, कर्नाटक आदि प्रदेशों में प्रदर्शन किया था।

लोगों को शेषन का कार्यकाल आया याद

साल 1952 में हुए लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक कुल 18 बार लोकसभा चुनाव हो चुके हैं। अंग्रेजों से देश की आजादी के बाद पहली बार लोकसभा के लिए आम चुनाव 1951-52 में हुए थे। लेकिन, मुख्य चुनाव आयुक्त क्या होता है, उसका दबदबा कैसा होता है, चुनाव आयोग कैसे काम करता है ये सब लोगों को पता चला टीएन शेषन के कार्यकाल में। शेषन अपनी सख्त और निष्पक्ष कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। उन्हें लोग आज भी याद करते हैं। शेषन वही थे जिन्होंने आयोग सभी दस्तावेजों पर लिखे भारत सरकार को हटवाया दिया था। शेषन तर्क था कि चुनाव आयोग सरकार का हिस्सा नहीं हो सकता। टीएन शेषन साल 1990 से 1996 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। उनके कार्यकाल से पहले चुनाव आयोग के आधिकारिक कागजों और लिफाफों पर “इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया” लिखा जाता था। शेषन ने इस पर आपत्ति जताई और “गवर्नमेंट ऑफ इंडिया” हटवाने का निर्देश दिया। उनका तर्क था कि चुनाव आयोग सरकार के अधीन काम करने वाला मंत्रालय या विभाग नहीं है। उन्होंने एक बार कहा था कि उनसे पहले के मुख्य चुनाव आयुक्त कानून मंत्री के दफ्तर के बाहर घंटों अपनी बारी का इंतजार करते थे। लेकिन मैंने तय कर लिया था कि मैं अपनी स्वायत्तता से कभी समझौता नहीं करूंगा। शेषन का तर्क था कि आयोग को चुनाव कराने, वोटर लिस्ट तैयार करने और चुनावी प्रक्रिया की निगरानी के लिए संविधान ने स्वतंत्र अधिकार दिए हैं। इसलिए उसके दस्तावेजों पर “भारत सरकार” लिखे होने से यह गलत धारणा बन सकती थी कि आयोग केंद्र सरकार का प्रशासनिक हिस्सा है। इसी वजह से शेषन ने चुनाव आचार संहिता, चुनाव खर्च, बूथ व्यवस्था, मतदाता पहचान पत्र और चुनावी कदाचार के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दों पर शेषन ने अपने अधिकारों का पूरा इस्तेमाल किया था। उनके कार्यकाल के दौरान ही आम मतदाताओं को महसूस हुआ कि चुनाव आयोग स्वतंत्र संस्था है।

हंगामा क्यों बरपा

ज्ञानेश कुमार को लेकर जो हंगामा बरपा है वो बेवजह नहीं है। दरअसल, 23 सितंबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के फैसलों और प्रशासनिक कदमों पर लिखित आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार दोनों आयुक्तों ने कहा कि कुछ फैसले उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए। रिपोर्ट में प्रशासनिक मुददे, वोटर लिस्ट, नए वोटर को जोड़ने, नाम हटाने और चुनावी डेटा की सुरक्षा से जुड़े मसलों का भी जिक्र है। नए मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए भरे जाने वाले फॉर्म-6 में कथित तौर पर ऐसा सवाल जोड़ा गया कि आवेदक, उसके माता-पिता या दादा-दादी पिछले विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की वोटर लिस्ट में मौजूद थे या नहीं। चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई 2026 में फाइल पर लिखा कि नियमों में बदलाव किए बिना फॉर्म-6 को इस तरह बदला नहीं जा सकता। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई। इसके बावजूद जुलाई में बदला हुआ फॉर्म ऑनलाइन दिखाई दिया। बाद में संधू ने इसे “अनधिकृत” और “अवैध” बताते हुए इसे तुरंत हटाने की मांग की। रिपोर्ट के मुताबिक, यह सवाल कुछ समय तक फॉर्म में बना रहा। मालूम हो कि फॉर्म-6 किसी राजनीतिक दल का फॉर्म नहीं, बल्कि नए मतदाता के पंजीकरण की वैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा है। अगर फॉर्म में अतिरिक्त शर्त जोड़ दी जाती है, तो वह नए मतदाता के अधिकार और पंजीकरण की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग लंबे समय से यह कहता रहा है कि वोटर लिस्ट तैयार करने की प्रक्रिया विकेंद्रीकृत है। स्थानीय स्तर पर इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिस यानी निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने, हटाने या सुधार करने की प्रक्रिया संभालते हैं। विवेक जोशी ने मतदाता डेटा तक पहुंच के धीरे-धीरे दिल्ली स्थित केंद्रीय आईटी व्यवस्था में सिमटने पर चिंता जताई। उन्होंने यह भी कहा कि यह सुनिश्चित करने के लिए ऑडिट होना चाहिए कि संबंधित वैधानिक अधिकारियों के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के पास मतदाता डेटाबेस में बदलाव करने की क्षमता न हो। संधू ने भी अधिकारियों की ओर से पोर्टल तक “पूरी और उचित पहुंच” नहीं होने की शिकायत दर्ज की। सवाल यह है कि अगर स्थानीय अधिकारी किसी मतदाता को योग्य पाते हैं, लेकिन केंद्रीय सॉफ्टवेयर उस फैसले को दर्ज ही नहीं होने देता, तो अंतिम निर्णय कानून के तहत नियुक्त अधिकारी का माना जाएगा या सॉफ्टवेयर का? इस खोजी रिपोर्ट में गोवा और पश्चिम बंगाल का उदाहरण दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान हटाए गए या बहाल किए गए मतदाताओं से जुड़े मामलों में लाखों अपीलें दायर हुईं। संधू ने सवाल उठाया कि चुनाव आयोग की ओर से इन अपीलों को दाखिल करने की अनुमति किसने दी और उन्हें किस अधिकारी ने दाखिल किया। उनका कहना था कि न तो उन्हें और न ही विवेक जोशी को इन अपीलों के आधार और प्रक्रिया की जानकारी दी गई। यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि चुनाव आयोग एक सामूहिक संवैधानिक संस्था है। अगर आयोग के नाम पर अदालत में अपील दायर की जाती है, तो उसके पीछे आयोग का स्पष्ट और अधिकृत निर्णय होना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया कि मई से अगस्त 2026 के बीच आयोग की पूरी बैठक नहीं हुई। रिपोर्ट के अनुसार 9 सितंबर को तीनों सदस्यों की पूरी बैठक हुई, जो चार महीने में पहली ऐसी बैठक थी। हालांकि इस रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने 14 लिखित आपत्तियों के अस्तित्व, तारीख या सामग्री को सीधे खारिज नहीं किया। हालांकि आयोग ने कहा कि ऐसे नोट, सुझाव और तकनीकी टिप्पणियां सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग के अनुसार, पिछले एक साल में लिए गए सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

बहरहाल, आजादी के बाद से अब लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव के साथ ही कई अन्य निकायों के चुनाव होते आ रहे हैं। दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश मंे इससे पहले शायद ही कभी चुनाव आयोग या मुख्य चुनाव आयुक्त इस तरह सवालों के घेरे मंे आया हो। सड़क से संसद और सुप्रीम कोर्ट तक मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर सवाल हो रहे हैं। वोट चोरी जैसे संगीन आरोप भी लगे हैं। जहां तक एसआईआर का सवाल है तो मृत मतदाताओं के नाम कटने, डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम कटने, फर्जी वोटरों के नाम हटाने को जायज ठहराया जा सकता है लेकिन यदि किसी के नाम पर टाइपिंग मिस्टेक हो, या फार्म भरते वक्त कोई गलती हो गई है तो उसे मतदान से वंचित किया जाना कहां तक सहीं होगा?, ग्रामीण इलाकों में रहने वाले या कई किसान-मजदूर तो पढ़े लिखे नहीं हैं ऐसे में उनका फार्म किसी और ने ही भरा होगा लिहाजा गलती होना वाजिब है। लोगों से तीन दशक पहले के या बाप-दादा के जमाने के कागज मांगे गए इनमें से कुछ मिले तो कुछ नहीं पहले के लोग इतने जागरूक नहीं होते थे तो क्या अब उनकी पीढ़ी को वोट देने नहीं दिया जाएगा? जिसने पिछले लोकसभा चुनाव या विधानसभा चुनाव में वोट दिया है उसका नाम भी एसआईआर से काट दिया गया ये कहां जायज है? ऐसे बहुत सारे सवाल है जो ऐसे ही उन 13 करोड़ वोटरों से जुड़े हैं जिनके नाम एसआईआर से हटा दिए गए हैं।

रिपोर्ट – मुस्ताअली बोहरा , भोपाल

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