शहडोल मध्य प्रदेश
शहडोल में ऋषि का समानांतर शासन
आबकारी नियमों की उड़ी धज्जियां, विभाग नतमस्तक
कलेक्टर की अध्यक्षता वाली समिति मौन
सफेद मार्शल से गांव-गांव पहुंच रहा अंग्रेजी जहर
शहडोल। संभागीय मुख्यालय समेत पूरे जिले में इन दिनों आबकारी नियमों को ताक पर रखकर एक विशेष सिंडिकेट का ऋषि साम्राज्य फल-फूल रहा है। जिले की शराब दुकानों पर ऋषि-त्रिपाठी के वर्चस्व ने न केवल सरकार के राजस्व को चुनौती दी है, बल्कि आम जनता और शासन की व्यवस्था को भी ठेंगा दिखा दिया है। विडंबना देखिए कि जिले की शराब दुकानों की समिति के अध्यक्ष स्वयं कलेक्टर होते हैं, लेकिन साहब की नाक के नीचे नियमों का ऐसा कत्लेआम शायद ही प्रदेश में कहीं और देखने को मिले।
कम्पोजिट के नाम पर लूट का खेल
नियमों के मुताबिक, सरकार ने अंग्रेजी और देशी शराब को एक ही कम्पोजिट दुकान के माध्यम से बेचने का प्रावधान इसलिए किया था ताकि उपभोक्ताओं को सुगमता हो, लेकिन शहडोल में ऋषि त्रिपाठी के सिंडिकेट ने लाभ के गणित को बदल दिया है। ज्यादा मुनाफे के फेर में मुख्यालय की दुकानों से देशी शराब को अघोषित रूप से बंद कर दिया गया है। जब कोई गरीब तबके का व्यक्ति देशी शराब मांगता है, तो उसे स्टॉक न होने का बहाना बनाकर भगा दिया जाता है। मजबूरी में उसे अपनी जेब ढीली कर महंगी अंग्रेजी शराब खरीदनी पड़ रही है। यह महज व्यापार नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक डकैती है।
मौत का सामान ढोती पैकारी एक्सप्रेस
शहर की तंग गलियों से लेकर सुदूर ग्रामीण अंचलों तक अंग्रेजी शराब की अवैध पैकारी का जाल बिछ चुका है। सूत्रों की मानें तो सफेद रंग की मार्शल गाडिय़ां इस सिंडिकेट की जीवनरेखा बन चुकी हैं। इन गाडिय़ों में भरकर अवैध रूप से शराब गांवों में खपाई जा रही है। नियम कहता है कि शराब की बिक्री केवल अधिकृत दुकान से ही हो सकती है, लेकिन ऋषि के राज में हर गांव, हर गली एक मिनी बार बन चुकी है।
अध्यक्ष कलेक्टर, पर निगरानी शून्य!
जिले की शराब दुकानों के संचालन और उन पर नियंत्रण की जिम्मेदारी कलेक्टर की अध्यक्षता वाली समिति की होती है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या कलेक्टर महोदय ने कभी इन दुकानों का औचक निरीक्षण करने की जहमत उठाई, क्या उनके किसी प्रतिनिधि ने कभी यह जांचने की कोशिश की कि दुकानों में क्या खेल चल रहा है। शराब दुकान पर किसी भी उपभोक्ता को बिल नहीं दिया जा रहा है। आबकारी अधिनियम के तहत हर बिक्री का कैश मेमो देना अनिवार्य है, लेकिन यहां तो ऋषि के करिंदों का ही कानून चलता है। बिना बिल की बिक्री से करोड़ों का टैक्स चोरी हो रहा है, जिसकी भरपाई अंतत: जनता को ही करनी पड़ती है।
मिलावट का डर और आबकारी की चुप्पी
जनचर्चा है कि अधिक लाभ कमाने के चक्कर में शराब में धड़ल्ले से मिलावट की जा रही है। मिलावटी शराब लोगों के लीवर और किडनी पर सीधा हमला कर रही है, लेकिन आबकारी विभाग के लैब टेस्ट और सैंपलिंग की प्रक्रिया फाइलों में कैद है। आबकारी विभाग के अधिकारी ऋषि के रसूख के आगे इतने बौने साबित हो रहे हैं कि वे दुकानों के अंदर कदम रखने से भी कतराते हैं।
अवैध महुआ का बढ़ता कारोबार
देशी शराब न मिलने के कारण गरीब तबका या तो महंगी अंग्रेजी शराब खरीदकर अपना घर फूंक रहा है या फिर जान जोखिम में डालकर कच्ची महुआ शराब की ओर रुख कर रहा है। इससे जिले में जहरीली शराब के कांड की आशंका बढ़ गई है। अगर कोई बड़ी अनहोनी होती है, तो क्या आबकारी विभाग और जिला प्रशासन इसकी जिम्मेदारी लेगा। शहडोल में आबकारी विभाग महज एक वसूली केंद्र बनकर रह गया है। ऋषि-त्रिपाठी का सिंडिकेट और प्रशासन की सांठ-गांठ ने पूरे जिले को नशे की गर्त में धकेल दिया है।
अजय पाल
