अवैध उत्खनन के पुराने मामले में फाइलों पर धूल, नए पट्टे के लिए विभाग में मची हलचल
ब्यौहारी नगर परिषद अध्यक्ष पर नियमों को ताक पर रखकर नवाजिश के आरोप
शहडोल -सरकारी खजाने को लाखों की चपत और रसूखदारों पर रहम—खनिज विभाग की कार्यशैली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। वर्ष 2017 से पत्थर के कथित अवैध उत्खनन मामले में ₹11 लाख से अधिक की शासकीय वसूली दबाए बैठे रसूखदार को अब नई पत्थर खदान सौंपने की जमीन तैयार की जा रही है। मामला ब्यौहारी नगर परिषद अध्यक्ष और भाजपा समर्थित नेता श्रीकृष्ण गुप्ता से जुड़ा होने के कारण प्रशासनिक गलियारों से लेकर राजनीतिक हलकों तक उथल-पुथल मची है।
वर्षों पुरानी बकाएदारी, फिर भी नवाजिश की तैयारी
विभागीय सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2017 में अवैध पत्थर उत्खनन की जांच के बाद संबंधित पक्ष पर 11 लाख रुपये से अधिक की राजस्व वसूली अधिरोपित की गई थी। विडंबना यह है कि सात वर्षों से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी यह राशि सरकारी खाते में जमा नहीं कराई गई। अब सवाल उठ रहा है कि जिस आवेदक पर शासन की लाखों रुपये की देनदारी लंबित हो, उसे नई खदान की पात्रता सूची में किस आधार पर आगे बढ़ाया जा रहा है?
वसूली पर ब्रेक, आवंटन को हरी झंडी?
स्थानीय स्तर पर आरोप लग रहे हैं कि राजनीतिक पद और सत्ता के प्रभाव के चलते खनिज विभाग के नियमों को लचीला बना दिया गया है। राजस्व वसूली की सख्त धाराओं को ठंडे बस्ते में डालकर नई खदान के आवंटन की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जा रही है।
जवाबदेही के दायरे में खनिज विभाग
यह प्रकरण केवल एक पट्टे के आवंटन का नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और सरकारी राजस्व की सीधी अनदेखी का है।
क्या नई खदान की स्वीकृति प्रक्रिया में पूर्व बकाए के अनापत्ति प्रमाण-पत्र (NOC) के नियमों को दरकिनार किया गया?
क्या राजनीतिक पद की आड़ में ₹11 लाख की शासकीय वसूली की फाइल दबा दी जाएगी?
अब निगाहें जिला प्रशासन और खनिज विभाग पर टिकी हैं कि क्या पहले राजकोष का बकाया वसूला जाएगा या फिर सत्ता के रसूख के आगे नियमों की बलि चढ़ा दी जाएगी।
अजय पाल






