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Home - क्षेत्रीय खबर - महाशिवरात्रि: इसी दिन हुई थी सृष्टि की शुरूआत
क्षेत्रीय खबर

महाशिवरात्रि: इसी दिन हुई थी सृष्टि की शुरूआत

policewalaBy policewalaFebruary 13, 2026Updated:February 13, 2026No Comments25 Views
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महाशिवरात्रि: इसी दिन हुई थी सृष्टि की शुरूआत

– शिव-पार्वती के विवाह का पर्व
– समुद्र से निकला था हलाहल

महाशिवरात्रि…….इसी दिन सृष्टि की शुरूआत हुई, इसी दिन शिव और पार्वती का विवाह हुआ, इसी दिन समुद्र से निकले विष को शिव ने पीकर दुनिया को अंधेरे से बचाया। महाशिवरात्रि भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। माघ फागुन फाल्गुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। महाशिवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है शिव की महान रात। पुरातन कथाओं के अनुसार इस दिन शिव नृत्य या तांडव करते हैं। महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। ऐसा माना जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान अमृत के साथ हलाहल नामक विष भी पैदा हुआ था। हलाहल विष में ब्रह्माण्ड को नष्ट करने की क्षमता थी और केवल भगवान शिव इसे नष्ट कर सकते थे। भगवान शिव ने हलाहल नामक विष को अपने कण्ठ में रख लिया था। जहर इतना शक्तिशाली था कि भगवान शिव अत्यधिक दर्द से पीड़ित हो उठे थे और उनका गला नीला हो गया था। इस कारण से भगवान शिव नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हैं। उपचार के लिए चिकित्सकों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जगाये रहने की सलाह दी। शिव को आनंदित करने और जगाये रखने के लिए देवताओं ने नृत्य किए और संगीत बजाए। जैसे सुबह हुई उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया। शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है जिससे शिव ने दुनिया को बचाया। विष पीकर शिव ने दुनिया को अंधेरे और निराशा से बचाया था। माना जाता है कि सृष्टि का प्रारम्भ महाशिवरात्रि से ही हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग (महादेव का ही स्वरूप) के उदय से हुआ। इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव व पत्नी पार्वती की पूजा होती हैं। यह पूजा व्रत रखने के दौरान की जाती है। यूं तो हर महीने यानि साल में 12 शिवरात्रि आती हैं लेकिन महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत के अलावा, नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, वेस्ट इंडीज सहित अन्य देशों में भी महाशिवरात्रि मनाई जाती है। कश्मीर शैव मत में इस त्यौहार को हर-रात्रि भी कहा जाता हैं। शिव जिनसे योग परंपरा की शुरुआत मानी जाती है को आदि (प्रथम) गुरु माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस रात को ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है जिससे मनुष्य में ऊर्जा का संचार होता है। इसे भौतिक और आध्यात्मिक रूप से लाभकारी माना जाता है इसलिए इस रात जागरण की भी परंपरा है। कई स्थानों पर महाशिवरात्रि की रात भजन-कीर्तन, जाप और अन्य धार्मिक कार्यक्रम होते हैं। महाशिवरात्रि को महिलाओं के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। विवाहित महिलाएँ अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और सुखी जीवन के लिए व्रत करती हैं। ये भी मान्यता है कि महाशिवरात्रि का व्रत रखने से अच्छा जीवनसाथी मिलता है, शीघ्र शादी के योग बनते हैं इसलिए कुंवारी कन्याएं भी व्रत रखती हैं। अविवाहित महिलाएं भगवान शिव, जिन्हें आदर्श पति के रूप में माना जाता है जैसे पति के लिए प्रार्थना करती हैं। ये व्रत स्त्री-पुरुष कोई भी कर सकता है। महाशिवरात्रि का व्रत अमोघ फल देने वाला माना गया है।
महाशिवरात्रि का पर्व पूरे देश में भक्ति भाव और आस्था के साथ मनाया जाता है। भारत के अलावा नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान में भी इस दिन पूजा होती है। बांग्लादेश में सनातन धर्मावलम्बी भगवान शिव के दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करने की मंशा से व्रत रखते हैं। कई बांग्लादेशी हिंदू इस खास दिन चंद्रनाथ धाम (चिटगांव) जाते हैं। बांग्लादेशी हिंदुओं की मान्यता है कि इस दिन व्रत व पूजा करने वाले स्त्री-पुरुष को अच्छा पति या पत्नी मिलती है। नेपाल में पशुपति नाथ में महाशिवरात्रि पर भव्य कार्यक्रम होता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर काठमांडू के पशुपतिनाथ मन्दिर पर भक्तजनों की भीड़ लगती है। चूंकि, नेपाल की सीमा भारत से लगती है और दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, व्यापारिक और आर्थिक संबंध हैं इसलिए भारत से भी कई हिन्दु धर्मावलम्बी महाशिवरात्रि पर काठमांडू पहुंचते हैं।
मध्यपदेश के उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि पर शिव भक्तों का हुजूम उमड़ता है, यहां दिन भर पूजा-अर्चना होती है। जेओनरा, सिवनी के मठ मंदिर में व जबलपुर के तिलवाड़ा घाट नामक दो अन्य स्थानों पर यह त्योहार बहुत धार्मिक उत्साह के साथ मनाया जाता है। दमोह जिले के बांदकपुर धाम में भी इस दिन लाखों लोगों का जमावड़ा रहता है। कश्मीर में कश्मीरी ब्राह्मणों के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। यह शिव और पार्वती के विवाह के रूप में हर घर में मनाया जाता है। महाशिवरात्रि का उत्सव तीन दिन पहले से शुरू हो जाता है और महाशिवरात्रि के दो दिन बाद तक चलता रहता है। आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के सभी मंदिरों में महाशिवरात्रि उत्साहपूर्वक मनाई जाती है।
महाशिवरात्रि साल में एक बार आती है जबकि शिवरात्रि हर महीने या साल में 12 बार। ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन करोड़ो सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए थे। ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव होने से यह पर्व महाशिवरात्रि के रुप में मनाया जाता है। महाशिवरात्रि पर्व भगवान शिव के दिव्य अवतरण का मंगलसूचक है, भोलेनाथ के निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है। इस दिन व्रत करने मात्र से हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं। इस दिन शिव पूजा करने वालों को महादेव काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों से मुक्त करके परम सुख, शांति प्रदान करते हैं। महादेव और माता पार्वती की शादी हुई थी इसलिए महाशिवरात्रि को रात्रि काल में भोलेनाथ की बारात निकाली जाती है। हिन्दू विद्वानों की मानें तो शिव पुराण के अनुसार चतुर्दशी तिथि शिवलिंग का प्राकट्य और विवाहोत्सव के रूप में जानी जाती है, इसलिए ये तिथि शिव की प्रिय है। यही कारण है कि हर महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है। इस दिन शिव पूजा करने वालों को वैवाहिक जीवन में सुख शांति और विवाह के लिए सुयोग्य जीवनसाथी पाने का वरदान मिलता है।
यूं तो देश के किसी राज्य में ज्योतिर्लिंग हैं या फिर शक्तिपीठ। इसके अलावा तीर्थ और धाम भी हैं। लेकिन देश में दो शहर ऐसे हैं जहां ज्योतिर्लिंग हैं और साथ ही शक्तिपीठ भी। मान्यता है कि जिन 51 स्थानों पर सती के अंग गिरे थे, वो स्थान शक्तिपीठ के रूप में पूजे गए। इन शक्तिपीठों में से दो ऐसे शक्तिपीठ हैं, जहां शिव के साथ ही शक्ति या शक्ति के साथ शिव के दर्शन का भी सौभाग्य प्राप्त होता है। ये दोनों ही भारत की प्राचीन नगरी यानि काशी और उज्जैन में स्थित है।
वाराणसी को बाबा विश्वनाथ की नगरी के नाम से जाना जाता है लेकिन इस पावन नगरी में शक्ति के पावन पीठ हैं। इनमें सबसे प्रमुख है मां विशालाक्षी का मंदिर, जो कि 51 शक्तिपीठों में से एक है। वाराणसी में स्थित इस मंदिर को दक्षिण वाली माता के नाम से जाना जाता है। मंदिर की बनावट से दक्षिण भारतीय कलाकृति देखने को मिलती है इसलिए इसे दक्षिण वाली माता का मंदिर भी कहा जाता है। मान्यता है कि वाराणसी में जहां पर माता का मंदिर है, वहां पर कभी भगवती सती का कर्ण कुंडल गिरा था। काशी स्थित इस शक्तिपीठ में माता विशालाक्षी की दो प्रतिमाओं के दर्शन करने को मिलते हैं, जिनमें से एक चल और दूसरी अचल मानी जाती है। यहां पर दोनों ही प्रतिमाओं का समान रूप से पूजा अभिषेक आदि होता है। माता का यह मंदिर काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के पास ही मीरघाट मोहल्ले में स्थित है।
मध्यप्रदेश की उज्जैयनी को लोग महाकाल की नगरी के नाम से जानते हैं, वहां पर द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एक महाकालेश्वर भगवान के साथ हरसिद्धि माता के शक्तिपीठ के दर्शन का सौभाग्य भी प्राप्त होता है। उज्जैन स्थित माता के इस शक्तिपीठ के बारे में मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवती सती की दाहिनी कोहनी गिरी थी। माता का यह पावन शक्तिपीठ महाकालेश्वर मंदिर के पास ही रुद्रसागर तालाब के पश्चिमी तट पर स्थित है। हरसिद्धि देवी के मंदिर की विशेषता यह है कि इसमें देवी का कोई विग्रह नहीं है, बल्कि सिर्फ कोहनी ही है, जिसे हरिसिद्धि देवी के रूप में पूजा जाता है। इस धाम में दो बड़े दीप-स्तंभ हैं, जिसे नर-नारी का प्रतीक माना जाता है। इसमें दाहिनी ओर का स्तंभ बड़ा है, जबकि बांई ओर का छोटा है इसे लोग शिव-शक्ति का प्रतीक भी मानते हैं। मान्यता है कि इस दीप स्तंभ पर दीप जलाने से मान्यता पूरी हो जाती है।
बारह ज्योतिर्लिंग (प्रकाश के लिंग) जो भगवान शिव के पवित्र धार्मिक स्थल और केन्द्र हैं। वे स्वयम्भू के रूप में जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है स्वयं उत्पन्न। बारह स्‍थानों पर बारह ज्‍योर्तिलिंग स्‍थापित हैं। सोमनाथ- यह शिवलिंग गुजरात के काठियावाड़ में स्थापित है। श्री शैल मल्लिकार्जुन- मद्रास में कृष्णा नदी के किनारे पर्वत पर स्थापित है श्री शैल मल्लिकार्जुन शिवलिंग। महाकाल- उज्जैन में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग, जहां शिवजी ने दैत्यों का नाश किया था। ओंकारेश्वर- मध्य प्रदेश के धार्मिक स्थल ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर पर्वतराज विंध्य की कठोर तपस्या से खुश होकर वरदान देने हुए यहां प्रकट हुए थे शिवजी। जहां ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित हो गया। नागेश्वर- गुजरात के द्वारकाधाम के निकट स्थापित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग। बैजनाथ- झारखंड के देवघर में बैद्यनाथ धाम में स्थापित शिवलिंग। भीमाशंकर- महाराष्ट्र की भीमा नदी के किनारे स्थापित भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग। त्र्यम्बकेश्वर- नासिक (महाराष्ट्र) से 25 किलोमीटर दूर त्र्यंबकेश्वर में स्थापित ज्योतिर्लिंग। घृष्णेश्वर- महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में एलोरा गुफा के समीप वेसल गाँव में स्थापित घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग। केदारनाथ- हिमालय का दुर्गम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग। हरिद्वार से 150 पर मिल दूरी पर स्थित है। काशी- विश्वनाथ बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग। रामेश्वरम- त्रिचनापल्ली (मद्रास) समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग।
ये देश भर में स्थित देवी के वो मंदिर है जहाँ देवी के शरीर के अंग या आभूषण गिरे थे। सबसे ज्यादा शक्ति पीठ बंगाल में है। बंगाल के शक्तिपीठों में शामिल हैं काली मंदिर- कोलकाता, युगाद्या-वर्धमान (बर्दमान), त्रिस्त्रोता- जलपाइगुड़ी, बहुला- केतुग्राम, वक्त्रेश्वर-दुब्राजपुर, नलहटी- नलहटी, नन्दीपुर- नन्दीपुर, अट्टहास- लाबपुर, किरीट- बड़नगर, विभाष-मिदनापुर। इसी तरह मध्यप्रदेश में जो शक्तिपीठ हैं उनमें हरसिद्धि- उज्जैन, शारदा मंदिर- मैहर और तारा चंडी मंदिर- अमरकंटक शामिल हैं। तमिलनाडु के शक्तिपीठ हैं शुचि- कन्याकुमारी, रत्नावली, भद्रकाली मंदिर- संगम स्थल और कामाक्षी देवी-शिवकांची। बिहार के शक्तिपीठ हैं मिथिला, बैद्यनाथ- बी. देवघर और पटनेश्वरी देवी- पटना। उत्तर प्रदेश के शक्तिपीठ हैं चामुण्डा माता- मथुरा, विशालाक्षी- मीरघाट और ललिता देवी मंदिर- प्रयाग। राजस्थान के शक्तिपीठों में शामिल हैं सावित्री देवी- पुष्कर और वैराट- जयपुर। गुजरात के शक्तिपीठ हैं अम्बिका देवी मंदिर- गिरनार और भैरव पर्वत- गिरनार। आंध्र प्रदेश के शक्तिपीठ हैं गोदावरी तट- गोदावरी स्टेशन और भ्रमराम्बा देवी- श्रीशैल। महाराष्ट्र के शक्तिपीठ हैं करवीर- कोल्हापुर और भद्रकाली- नासिक। कश्मीर में जो शक्तिपीठ हैं उनमें पार्वती पीठ- अमरनाथ गुफा और श्री पर्वत- लद्दाख में है। तिब्बत में शक्तिपीठ है मानस शक्तिपीठ-मानसरोवर। पंजाब में विश्वमुखी मंदिर- जालंधर शक्तिपीठ है। उड़ीसा में विरजादेवी- जाजपुर, हिमाचल प्रदेश में ज्वालामुखी शक्तिपीठ-कांगड़ा, असम में विश्वविख्यात कामाख्या देवी-गुवाहाटी शामिल है। मेघालय में जयंती- शिलांग, त्रिपुरा में राजराजेश्वरी त्रिपुरा सुंदरी- राधाकिशोरपुर, हरियाणा में कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ- कुरुक्षेत्र और कालमाधव शक्तिपीठ है। भारत के अलावा नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश में भी शक्तिपीठ स्थापित है। नेपाल के शक्तिपीठ हैं गण्डकी- गण्डकी और भगवती गुहेश्वरी- पशुपतिनाथ। पाकिस्तान के शक्तिपीठ हैं हिंगलाज देवी- हिंगलाज। श्रीलंका में लंका शक्तिपीठ स्थापित है। बांग्लादेश में शक्तिपीठ है, इनमें यशोर- जैसोर, भवानी मंदिर- चटगांव, करतोयातट- भवानीपुर, उग्रतारा देवी- बारीसाल और पंचसागर शक्तिपीठ स्थापित है।

रिपोर्ट -मुस्ताअली बोहरा
अधिवक्ता एवं लेखक
भोपाल

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