गरियाबंद वन मंडल की भंडार शाखा में करोड़ों की खरीदी पर सवाल
गरियाबंद। वन मंडल गरियाबंद की भंडार शाखा में वित्तीय वर्ष 2024-25 एवं 2025-26 के दौरान शासकीय राशि से की गई कथित करोड़ों रुपये की खरीदी अब सवालों के घेरे में है। बिल-वाउचर, क्रय अभिलेख, स्टॉक रजिस्टर एवं आवक-जावक प्रविष्टियों को लेकर अनियमितता और फर्जी भुगतान के आरोप सामने आने के बाद मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है।
सामान आया या कागजों में हुई करोड़ों की खरीदी?
मामले से जुड़े एक वन अधिकारी ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर दावा किया है कि संबंधित अवधि में कुछ खरीदी मामलों में वास्तविक सामग्री की आवक और बिल-वाउचर के बीच अंतर होने की आशंका है। आरोप है कि कुछ मामलों में सामग्री की वास्तविक प्राप्ति के बजाय दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी कर भुगतान कराए जाने की बात सामने आई है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
RTI में दस्तावेज मांगे तो आवेदन निरस्त
मामले में आवेदक नरेंद्र कुमार द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत संबंधित बिल-वाउचर, क्रय अभिलेख, भंडार रजिस्टर, भुगतान दस्तावेज एवं अन्य रिकॉर्ड की जानकारी मांगी गई थी। आवेदक के अनुसार, जनसूचना अधिकारी/वनमंडलाधिकारी गरियाबंद ने जानकारी उपलब्ध कराने के बजाय आवेदन निरस्त कर दिया तथा आदेश में विभिन्न न्यायालयीन फैसलों का हवाला दिया गया।
आवेदक का सवाल है कि जिन न्यायिक निर्णयों का उल्लेख किया गया, उनकी मांगी गई वन विभागीय खरीदी एवं अभिलेखों से वास्तविक प्रासंगिकता क्या है? साथ ही प्रत्येक सूचना को रोकने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम की कौन-सी वैधानिक अपवाद-धारा लागू होती है, इसका स्पष्ट आधार भी सामने आना चाहिए।
प्रथम अपील के निर्णय पर भी सवाल
जनसूचना अधिकारी के निर्णय के विरुद्ध आवेदक ने प्रथम अपील दायर की। आवेदक का आरोप है कि प्रथम अपीलीय अधिकारी, वनसंरक्षक रायपुर वृत्त रायपुर, ने जनसूचना अधिकारी के निर्णय को बरकरार रखा और मांगी गई सूचना उपलब्ध नहीं कराई।
आवेदक ने प्रथम अपीलीय अधिकारी की पूर्व पदस्थापना को लेकर भी निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। हालांकि पूर्व पदस्थापना मात्र से पक्षपात सिद्ध नहीं होता, इसलिए इस संबंध में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए सक्षम स्तर पर तथ्यात्मक परीक्षण आवश्यक होगा।
सरकारी धन से हुई खरीदी, तो रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच के दायरे में क्यों नहीं?
मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि मांगी गई जानकारी सरकारी राशि से की गई खरीदी और उसके भुगतान से संबंधित बताई जा रही है। ऐसे में यह जांच का विषय है कि संबंधित रिकॉर्ड वास्तव में किस वैधानिक अपवाद के अंतर्गत रोके गए।
यदि किसी दस्तावेज में तृतीय पक्ष की निजी जानकारी है, तो RTI अधिनियम की धारा 10 के तहत पृथक्करण की संभावना पर विचार किया जा सकता है। वहीं धारा 11 लागू होने की स्थिति में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं, यह भी रिकॉर्ड से स्पष्ट होना चाहिए।
मूल दस्तावेज खुलेंगे तो सामने आएगी असली तस्वीर
मामले में लगाए जा रहे आरोपों की वास्तविकता मूल बिल-वाउचर, स्टॉक रजिस्टर, आवक-जावक रजिस्टर, भुगतान अभिलेख, सामग्री प्राप्ति प्रमाण-पत्र एवं सत्यापन दस्तावेजों के स्वतंत्र परीक्षण से ही स्पष्ट हो सकती है।
यदि सामग्री वास्तव में खरीदी और प्राप्त की गई है तो उसके समर्थन में वैध क्रय एवं स्टॉक रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए। वहीं दस्तावेज और भौतिक स्टॉक में अंतर मिलने पर वित्तीय अनियमितता की गंभीरता का निर्धारण जांच के आधार पर किया जा सकेगा।
अब सवाल केवल करोड़ों की कथित खरीदी का नहीं, बल्कि यह भी है कि सरकारी धन से हुई खरीदी के दस्तावेजों को किस आधार पर रोका गया और RTI आवेदन निरस्त करने के लिए उद्धृत न्यायालयीन निर्णयों की संबंधित सूचना से वास्तविक प्रासंगिकता क्या है।
निष्पक्ष जांच की मांग
आवेदक ने संबंधित अवधि के सभी क्रय एवं भुगतान अभिलेखों का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष परीक्षण कराने तथा नियमानुसार उपलब्ध कराई जा सकने वाली सूचना प्रदान किए जाने की मांग की है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामला केवल रिकॉर्ड संबंधी विवाद है या वास्तव में वित्तीय अनियमितता हुई है।
रिपोर्ट नेहरू साहू जिला ब्यूरो गरियाबंद







