डिंडौरी मध्यप्रदेश
रिपोर्ट अखिलेश झारिया

बांस शूट को ‘नॉवल फूड’ के रूप में विकसित करने पर शोध, प्रोटीन-फाइबर से भरपूर उत्पादों की संभावनाएं; जनजातीय क्षेत्रों में खाद्य प्रसंस्करण से खुल सकते हैं आजीविका के नए अवसर

डिंडौरी। टोकरी, फर्नीचर और घरेलू उपयोग की वस्तुओं तक सीमित माने जाने वाले बांस की पहचान अब पौष्टिक खाद्य उत्पाद के रूप में भी विकसित हो सकती है। डिंडौरी से जुड़े शोधकर्ता डॉ. विकास जैन ने बांस की खाने योग्य कोंपल, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘करिल’ के नाम से जाना जाता है, को वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्कृत कर बिस्किट, क्रिस्पी नमकीन और इंस्टेंट नूडल्स जैसे खाद्य उत्पाद तैयार करने पर शोध किया है। शोध के परिणाम बांस आधारित खाद्य प्रसंस्करण के साथ जनजातीय क्षेत्रों में रोजगार और स्थानीय उद्यमिता की नई संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं।

डॉ. जैन ने मध्यप्रदेश के डिंडौरी, मंडला, बालाघाट और शहडोल क्षेत्रों में पाई जाने वाली खाने योग्य बांस प्रजाति डेंड्रोकैलमस हैमिल्टोनाई की कोंपलों का अध्ययन किया। जनजातीय समुदायों में लंबे समय से सब्जी के रूप में उपयोग की जाने वाली करिल को वैज्ञानिक प्रक्रिया से पाउडर और पेस्ट में परिवर्तित कर विभिन्न खाद्य उत्पादों में इस्तेमाल किया गया।

सुरक्षित प्रोसेसिंग पर रहा विशेष जोर

शोध में बांस की कोंपलों को खाद्य उपयोग के लिए तैयार करने की प्रक्रिया पर विशेष ध्यान दिया गया। कच्चे पेस्ट के साथ कोंपलों को करीब 20 मिनट तक उबालने और 24 घंटे पानी में भिगोने जैसी प्रक्रियाओं का अध्ययन किया गया। इसका उद्देश्य कोंपलों की कड़वाहट तथा उनमें प्राकृतिक रूप से मौजूद सायनोजेनिक यौगिकों को कम करना था। शोध में बांस शूट को खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोग करने से पहले उचित और सुरक्षित प्रोसेसिंग को महत्वपूर्ण माना गया है।

बांस पाउडर और पेस्ट से तैयार किए बिस्किट

प्रयोग के दौरान बांस शूट के पाउडर और पेस्ट को बिस्किट सहित अन्य खाद्य उत्पादों में मिलाकर उनकी स्वीकार्यता एवं पोषण संबंधी विशेषताओं का अध्ययन किया गया। शोध में बांस शूट में प्रोटीन, फाइबर, विटामिन-सी और आवश्यक अमीनो एसिड जैसे पोषक तत्वों की मौजूदगी का उल्लेख किया गया है।

बांस पाउडर की करीब 10 प्रतिशत और पेस्ट की 20 प्रतिशत मात्रा के उपयोग से तैयार बिस्किट की स्वीकार्यता को लेकर सकारात्मक परिणाम सामने आने की बात कही गई है। इसके अलावा बांस शूट से क्रिस्पी नमकीन और इंस्टेंट नूडल्स जैसे उत्पाद तैयार करने के प्रयोग भी किए गए। इससे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बांस कोंपलों को मूल्यवर्धित खाद्य उत्पादों में बदलने की संभावनाएं सामने आई हैं।

जनजातीय युवाओं के लिए बन सकता है स्वरोजगार का जरिया

डिंडौरी सहित प्रदेश के कई जनजातीय इलाकों में बांस पारंपरिक जीवन और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। अब तक इसका उपयोग टोकरी, घरेलू सामग्री, निर्माण और सजावटी वस्तुओं में प्रमुखता से होता रहा है। ऐसे में बांस की कोंपलों से खाद्य उत्पाद तैयार करने की तकनीक व्यावहारिक और व्यावसायिक स्तर पर विकसित होती है तो यह स्थानीय लोगों के लिए आय का अतिरिक्त माध्यम बन सकती है।

वैज्ञानिक प्रोसेसिंग, खाद्य सुरक्षा मानकों, पैकेजिंग और बाजार की समुचित व्यवस्था के साथ बांस आधारित छोटे खाद्य प्रसंस्करण उद्यम स्थापित करने की दिशा में भी संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं। इससे विशेष रूप से जनजातीय युवाओं और स्व-सहायता समूहों को स्थानीय संसाधनों पर आधारित स्वरोजगार से जोड़ने का रास्ता बन सकता है।

‘हरे सोने’ को खाद्य उत्पाद के रूप में नई पहचान देने की पहल

डॉ. विकास जैन का शोध बांस के पारंपरिक उपयोग से आगे बढ़कर उसकी खाद्य और पोषण संबंधी उपयोगिता की ओर ध्यान खींचता है। यदि शोध आधारित उत्पादों को खाद्य सुरक्षा मानकों और व्यावसायिक व्यवहार्यता के अनुरूप आगे विकसित किया जाता है तो वन आधारित संसाधनों के मूल्य संवर्धन के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिल सकता है।

विश्व बांस दिवस के अवसर पर सामने आया यह शोध बांस को केवल शिल्प और निर्माण सामग्री के ‘हरे सोने’ के रूप में नहीं, बल्कि खाद्य प्रसंस्करण, पोषण और ग्रामीण उद्यमिता से जोड़ने की नई दिशा प्रस्तुत करता है।

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