डिंडौरी मध्यप्रदेश
रिपोर्ट अखिलेश झारिया
*पैरों में टैग, शरीर पर GPS डिवाइस लगाए गिद्ध ने बढ़ाया कौतूहल, वन विभाग ने बताया संरक्षण अभियान का हिस्सा*
अमरपुर (डिंडौरी)। डिंडौरी जिले के अमरपुर जनपद अंतर्गत भेसवाही सरई टोला एवं उमरिया गवारी टोला में इन दिनों एक विशेष गिद्ध ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। पैरों में नंबर वाला टैग और शरीर पर उपकरण लगाए इस गिद्ध को देखकर ग्रामीणों में पहले दहशत और जिज्ञासा का माहौल बन गया, लेकिन बाद में वन विभाग ने इसे दुर्लभ गिद्ध प्रजाति के संरक्षण अभियान से जुड़ा पक्षी बताया।
ग्रामीणों के अनुसार यह गिद्ध करीब दो दिनों तक क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर मंडराता और बैठता रहा। पक्षी के शरीर पर लगे उपकरण को देखकर गांव में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। कुछ लोग इसे किसी रहस्यमयी गतिविधि से जोड़कर देख रहे थे, जबकि कई ग्रामीण इसे निगरानी मिशन का हिस्सा मान रहे थे।
सूचना मिलने पर वन विभाग का अमला मौके पर पहुंचा और गिद्ध का निरीक्षण किया। अधिकारियों ने ग्रामीणों को जानकारी दी कि यह कोई सामान्य पक्षी नहीं, बल्कि विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी गिद्ध प्रजाति के संरक्षण कार्यक्रम का हिस्सा है। इसके पैरों में पहचान के लिए टैग लगाया गया है, जबकि शरीर पर लगा उपकरण GPS ट्रैकिंग डिवाइस है।
वन विभाग के अनुसार GPS ट्रैकिंग के माध्यम से विशेषज्ञ गिद्धों की गतिविधियों, उनके भ्रमण क्षेत्र, ठहराव स्थलों और व्यवहार का अध्ययन करते हैं। इससे संरक्षण संबंधी योजनाओं को प्रभावी बनाने में मदद मिलती है।
प्राथमिक जानकारी के अनुसार यह गिद्ध सिवनी जिले की दिशा से डिंडौरी क्षेत्र में पहुंचा था। माना जा रहा है कि भोजन की तलाश, मौसमीय परिस्थितियों अथवा प्राकृतिक भ्रमण के दौरान यह सरई टोला क्षेत्र तक आया। दो दिन क्षेत्र में रहने के बाद यह पुनः आगे निकल गया।
गिद्ध को नजदीक से देखने के लिए ग्रामीणों की भीड़ जुटती रही। गांव के बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक सभी में इसे लेकर उत्सुकता देखने को मिली। कई लोगों ने पहली बार किसी गिद्ध को इतने करीब से देखा, वह भी आधुनिक ट्रैकिंग तकनीक के साथ।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार गिद्ध पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मृत पशुओं को खाकर ये प्राकृतिक सफाईकर्मी का कार्य करते हैं, जिससे विभिन्न प्रकार की बीमारियों के फैलाव को रोकने में सहायता मिलती है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में इनकी संख्या में तेजी से गिरावट आई है, जिसके चलते संरक्षण के लिए टैगिंग और GPS मॉनिटरिंग जैसी तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है।
इस घटना ने क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों को लेकर नई जागरूकता पैदा की है। जिस गिद्ध को शुरुआत में ग्रामीण रहस्यमयी पक्षी समझ रहे थे, वही अब संरक्षण प्रयासों और वन्यजीव अनुसंधान का एक जीवंत उदाहरण बन गया है।

