टीईटी अनिवार्यता पर शिक्षकों की एकजुटता—कानून, व्याख्या और वास्तविकता का टकराव
भोपाल में आयोजित विशाल प्रदर्शन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षक वर्ग अब अपने सम्मान, अधिकार और न्याय के लिए एकजुट हो चुका है। यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि एक ऐसी आवाज़ है जिसके दूरगामी परिणाम निश्चित रूप से देखने को मिलेंगे।
शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को लेकर वर्तमान विवाद को समझने के लिए इसके कानूनी और व्यावहारिक पक्ष को संतुलित दृष्टि से देखना आवश्यक है। वर्ष 2017 में जो संशोधन किया गया, वह मूल रूप से टीईटी की अनिवार्यता हेतु समय-सीमा (चार वर्ष) बढ़ाने के उद्देश्य से था। इस संशोधन में सेवारत शिक्षकों के लिए कोई नया प्रावधान नहीं जोड़ा गया, बल्कि पूर्व से लागू प्रावधानों को ही अधिक स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया गया।
वास्तविकता यह है कि
आरटीई एक्ट में टीईटी का प्रावधान भले ही सभी शिक्षकों के लिए उल्लेखित है, किंतु राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा जारी अधिसूचनाओं में अधिकांश सेवारत शिक्षकों को व्यावहारिक आधार पर छूट प्रदान की गई है। यही कारण है कि वर्षों से कार्यरत लगभग 98% शिक्षक इस अनिवार्यता से मुक्त रहे हैं।
भोपाल में 18 अप्रैल को आयोजित कार्यक्रम में भी यह तथ्य स्पष्ट रूप से सामने रखा गया और शिक्षकों ने हाथ उठाकर इस वास्तविकता को स्वीकार किया। हालांकि, एक छोटा वर्ग—लगभग 2% शिक्षक—ऐसा है जो इस व्यवस्था के दायरे में प्रभावित हो सकता है। विशेष रूप से वे प्राथमिक शिक्षक जो B.Ed धारक हैं तथा 3 सितम्बर 2001 के बाद नियुक्त हुए हैं, जिनके लिए 6 माह का BTC प्रशिक्षण आवश्यक बताया गया है।
विवाद की जड़ क्या है?
यह पूरा विवाद कानून और उसकी व्याख्या के बीच के अंतर से उत्पन्न हुआ है।
एक ओर आरटीई एक्ट का मूल प्रावधान है
दूसरी ओर NCTE की व्यावहारिक छूट है
और तीसरी ओर न्यायालय की सख्त व्याख्या है
न्यायालय ने अधिनियम की मूल भावना को प्राथमिकता देते हुए निर्णय दिया, जबकि शिक्षक वर्ग NCTE द्वारा दी गई छूट और वर्षों से चली आ रही व्यवस्था को आधार मानता है। यही कारण है कि आज यह टकराव उत्पन्न हुआ है।
शिक्षकों की स्पष्ट मांग
अब जबकि राज्य सरकार द्वारा पुनर्विचार याचिका दायर की जा चुकी है, शिक्षकों की यह स्पष्ट मांग है कि जब तक न्यायालय से अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक टीईटी की प्रक्रिया को स्थगित किया जाए। साथ ही, केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजकर आरटीई एक्ट में आवश्यक संशोधन सुनिश्चित किया जाए, जिससे वर्षों से कार्यरत शिक्षकों के साथ न्याय हो सके।
यह आंदोलन किसी नियम के विरोध का नहीं, बल्कि न्यायसंगत समाधान की मांग का है। शिक्षक वर्ग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह न केवल कानून का सम्मान करता है, बल्कि अपनी गरिमा और अधिकारों की रक्षा के लिए भी प्रतिबद्ध है।
मंडला से अशोक मिश्रा की रिपोर्ट







