जिले में शासकीय शिक्षा व्यवस्था पर माफियानुमा कब्ज़ा! बच्चों के भविष्य से खुला खिलवाड़

 

खंडहर स्कूल, शिक्षक विहीन शालाएं और नियमों को ठेंगा दिखाते अधिकारी — प्रशासन मौन क्यों?

 

छात्रावास व्यवस्था सवालों में: वर्षों से जमे अधीक्षक, नियम बेअसर”

 

मण्डला -जिले में शासकीय स्कूलों की हालत अब केवल बदहाली नहीं, बल्कि एक सुनियोजित उपेक्षा और भ्रष्ट तंत्र की तस्वीर बन चुकी है। स्कूल भवनों की जर्जर स्थिति, बच्चों के अनुरूप शौचालयों का अभाव, शिक्षक विहीन शालाएं और शिक्षा के नाम पर औपचारिकताएं—ये सब उस व्यवस्था की कहानी कहते हैं, जिसे जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने जानबूझकर भगवान भरोसे छोड़ दिया है।

जिले के कई शासकीय स्कूल आज भी अधूरे या खंडहरनुमा भवनों में संचालित हो रहे हैं। कहीं बारिश में कक्षाएं बंद करनी पड़ती हैं तो कहीं छत गिरने का डर बना रहता है। शौचालयों की स्थिति इतनी भयावह है कि छोटे बच्चों, विशेषकर बालिकाओं के लिए स्कूल आना ही एक चुनौती बन चुका है। सवाल यह है कि करोड़ों रुपये के बजट आखिर गए कहां?

शिक्षा व्यवस्था की कमर तोड़ने का सबसे बड़ा कारण शिक्षकों की अव्यवस्थित पदस्थापना है। कुछ विकासखंडों में शिक्षक अतिशेष घोषित हैं, जबकि कई स्कूल ऐसे हैं जहां एक भी शिक्षक पदस्थ नहीं है। कई शिक्षक वर्षों से गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए गए हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित हो रही है। क्या यह लापरवाही है या जानबूझकर सरकारी स्कूलों को कमजोर करने की साजिश?

परिणाम सामने है—शासकीय स्कूलों में बच्चों की संख्या तेजी से घट रही है और निजी स्कूलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। आमजन में यह धारणा बन चुकी है कि शासकीय स्कूलों में पढ़ाई करने से बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो सकता है। लेकिन इस गंभीर स्थिति पर न तो जनप्रतिनिधियों की नींद टूट रही है और न ही जिला प्रशासन जवाबदेही लेने को तैयार है।

मीडिया द्वारा बार-बार खबरें प्रकाशित कर जमीनी सच्चाई उजागर की जा रही है, इसके बावजूद प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या मीडिया द्वारा सामने लाई गई सच्चाई से किसी को फर्क नहीं पड़ता, या फिर यह चुप्पी किसी गहरे गठजोड़ का संकेत है?

खोजी पड़ताल में यह भी सामने आया है कि जनजाति कार्य विभाग और समग्र शिक्षा अभियान (एजूकेशन)  के तहत संचालित छात्रावासों में वर्षों से एक ही अधीक्षक जमे हुए हैं। शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि तीन वर्षों में अधीक्षक का स्थानांतरण किया जाए, अधिकतम पांच वर्ष की सीमा तय है, लेकिन जिले में इन नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

सूत्रों के अनुसार अधीक्षकों को एक ही छात्रावास में बनाए रखने के पीछे अधिकारियों से मजबूत तालमेल और कथित लेन-देन की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि कई अधीक्षक नियमों के विपरीत छात्रावासों में निवास नहीं करते। वे केवल खानापूर्ति की उपस्थिति दर्ज कर चले जाते हैं और बच्चों की पूरी जिम्मेदारी चौकीदार के भरोसे छोड़ दी जाती है।

इस लापरवाही का सीधा असर छात्रावासों में रह रहे गरीब और आदिवासी बच्चों पर पड़ रहा है। सुरक्षा, पढ़ाई और मूलभूत सुविधाओं से वंचित ये बच्चे उस सिस्टम की कीमत चुका रहे हैं, जो कागजों में तो नियमों का पालन करता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे कोसों दूर है।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या जिले के जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी इस स्थिति की नैतिक जिम्मेदारी लेंगे? या फिर शिक्षा के नाम पर चल रहे इस खेल में यूं ही बच्चों का भविष्य दांव पर लगा रहेगा? यदि समय रहते भ्रष्टाचार, लापरवाही और नियमों की अवहेलना पर सख़्त कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले समय में यह शिक्षा व्यवस्था नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अपराध के रूप में दर्ज होगी।

मंडला से अशोक मिश्रा की रिपोर्ट

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