गरियाबंद में आदिम जाति कल्याण विभाग के दैनिक वेतनभोगी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों ने अपनी सात सूत्रीय मांगों को लेकर गांधी मैदान में अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी है। वर्षों से विभाग में सेवाएं दे रहे कर्मचारी अब नियमितीकरण, लंबित मानदेय भुगतान और हटाए गए कर्मचारियों की पुनः बहाली की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि विभाग लगातार उनकी समस्याओं को टालता आ रहा है, जिससे उनमें भारी नाराजगी है।

हड़ताल पर बैठे कर्मचारियों का कहना है कि उनके कई साथी पिछले 10 से 15 वर्षों से विभाग में कार्यरत हैं, लेकिन आज तक उन्हें स्थायी रोजगार का दर्जा नहीं मिला। कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि लंबे समय से मानदेय भुगतान लंबित है और कुछ कर्मचारियों को बिना स्पष्ट कारण कार्य से अलग कर दिया गया।

सबसे बड़ा सवाल तब खड़ा हुआ जब विभाग से हटाए गए कर्मचारियों के संबंध में अधिकारियों से जानकारी ली गई। कर्मचारियों का आरोप है कि वर्तमान अधिकारियों ने इस मामले की जिम्मेदारी पूर्व में पदस्थ अधिकारी नवीन भगत पर डालते हुए खुद को अलग बताने की कोशिश की। इससे विभाग की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं। कर्मचारियों का कहना है कि यदि नियुक्ति और कार्य वर्षों तक विभाग के अधीन हुआ, तो फिर कर्मचारियों को हटाने और उनके भविष्य से जुड़े फैसलों की जवाबदेही कौन लेगा?
कर्मचारियों ने यह भी कहा कि विभाग एक ओर उनसे लगातार कार्य लेता रहा, वहीं दूसरी ओर उनके अधिकारों और भविष्य को लेकर स्पष्ट नीति सामने नहीं रखी गई। यही कारण है कि अब कर्मचारियों का आक्रोश खुलकर सामने आ गया है।
इधर विभागीय अधिकारियों का कहना है कि कुछ कर्मचारियों का पूर्व अवधि का मानदेय लंबित है तथा अतिरिक्त कार्य के भुगतान के लिए बजट की मांग शासन को भेजी गई है। बजट प्राप्त होते ही नियमानुसार भुगतान की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। वहीं नियमितीकरण सहित अन्य मांगें शासन स्तर पर विचाराधीन बताई जा रही हैं।
*हालांकि कर्मचारियों का कहना है कि वर्षों से उन्हें केवल आश्वासन ही मिलते रहे हैं। अब यह आंदोलन विभाग की प्रशासनिक कार्यशैली और कर्मचारियों के प्रति जवाबदेही पर बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है।* देखना होगा कि शासन और विभाग इस बढ़ते असंतोष को शांत करने के लिए कब तक ठोस कदम उठाते हैं।
रिपोर्ट: नेहरू साहू, जिला ब्यूरो, गरियाबंद







