महानदी तट पर उजड़ रहा 47 एकड़ का हरित संसार, रातोंरात बहाल हो जाती है काटी गई सड़क; खनिज विभाग की कार्रवाई और सूचना लीक होने की आशंका पर उठे सवाल
गरियाबंद। एक ओर शासन पर्यावरण संरक्षण, हरियाली संवर्धन और जलवायु संतुलन के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर पौधरोपण अभियान चला रहा है, तो दूसरी ओर राजिम के निकट ग्राम पंचायत पितईबंद में महानदी तट पर विकसित सामाजिक वानिकी का अस्तित्व रेत के अवैध उत्खनन की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। वर्ष 2014-15 में लगभग 47 एकड़ राजस्व भूमि पर रोपे गए हजारों शीशम के वृक्षों में से 20 हजार से अधिक वृक्षों के धराशायी होने की जानकारी सामने आई है। सवाल यह है कि जो हाथ हरियाली उगाने के लिए उठे थे, क्या वे अब रेत के लालच में उजड़ते जंगल को बचाने में भी नाकाम साबित हो रहे हैं?

30 हजार पौधों से लहलहाया जंगल, अब उजड़ने की कगार पर
वर्ष 2014-15 में ग्राम पितईबंद के महानदी तट पर नदीतट सामाजिक वानिकी योजना के अंतर्गत लगभग 30 हजार शीशम पौधों का रोपण किया गया था। वर्षों की मेहनत के बाद ये पौधे विकसित होकर वृक्ष बन चुके थे। यह क्षेत्र पर्यावरण संरक्षण और हरित आवरण बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल था। लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों से क्षेत्र में जारी रेत के अवैध उत्खनन और वृक्षों के गिरने की घटनाओं ने इस हरित विरासत को गंभीर संकट में डाल दिया है।
वन परिक्षेत्र अधिकारी फिंगेश्वर के निरीक्षण प्रतिवेदन के अनुसार, ग्राम पितईबंद के राजस्व क्षेत्र में खसरा नंबर 356/1 एवं 176 पर सामाजिक वानिकी के तहत 22 हजार शीशम शिशु वृक्षों का रोपण किया गया था। योजना की पांच वर्षीय अवधि पूरी होने के बाद रोपण क्षेत्र ग्राम पंचायत को हस्तांतरित कर दिया गया। प्रतिवेदन में उल्लेख है कि मौके पर अवैध रेत उत्खनन के कारण रोपण क्षेत्र के वृक्ष जड़ सहित उखड़कर गिर रहे हैं।

रेत की खातिर हरियाली की बलि, जिम्मेदारी से बचने की कवायद?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब रोपण क्षेत्र ग्राम पंचायत को हस्तांतरित किया जा चुका है, तो उसकी सुरक्षा और संरक्षण की जिम्मेदारी किस तरह निभाई जा रही है? आरोप है कि पंचायत स्तर पर रेत के अवैध उत्खनन पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है। वहीं, पंचायत प्रतिनिधियों द्वारा रोपण क्षेत्र को वन विभाग के सुपुर्द करने की मांग भी की जा रही है।
यदि वृक्षों की सुरक्षा की जिम्मेदारी पंचायत के पास है, तो आखिर इतने बड़े पैमाने पर वृक्षों के नष्ट होने की नौबत कैसे आई? और यदि स्थानीय स्तर पर अवैध उत्खनन रोकना मुश्किल हो रहा है, तो संबंधित विभागों की संयुक्त कार्रवाई अब तक निर्णायक क्यों नहीं बन सकी?
विडंबना देखिए—जिस हरियाली को तैयार होने में वर्षों लगे, उसे उजाड़ने के लिए कथित रेत चोरों को कुछ ही समय काफी साबित हो रहा है।
रात में सड़क कटती है, सुबह फिर तैयार! रेत चोरों के हौसले बुलंद
सरपंच प्रतिनिधि सहदेव बंजारे के अनुसार, महानदी तट पर दिन-रात रेत का अवैध उत्खनन होता है। खनिज विभाग को लगातार सूचना देने के बाद कभी-कभार कार्रवाई होती है, लेकिन अगले ही दिन स्थिति फिर पहले जैसी हो जाती है।

रेत के अवैध परिवहन पर रोक लगाने के लिए ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों ने कई बार नदी तट तक जाने वाली कच्ची सड़क को काटकर आवागमन बाधित करने का प्रयास किया। हाल ही में भी सड़क काटी गई थी, लेकिन आरोप है कि रेत निकालने वालों ने रातोंरात सड़क दुरुस्त कर दी और उत्खनन फिर शुरू हो गया।
अब सवाल यह है कि यदि सड़क काटने के बावजूद कुछ ही घंटों में आवागमन बहाल हो जाता है, तो क्या संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था पर्याप्त है? आखिर अवैध उत्खनन करने वालों को इतनी बेखौफी कहां से मिल रही है?
खनिज विभाग की कार्रवाई पर सवाल, क्या पहले ही मिल जाती है दबिश की खबर?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी सामने आ रही है कि जिला मुख्यालय से खनिज विभाग की टीम कार्रवाई के लिए निकलती है, तो कथित रेत चोरों को इसकी भनक पहले ही लग जाती है। हालांकि, इस आशंका की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही किसी अधिकारी-कर्मचारी की मिलीभगत का प्रमाण सामने आया है। फिर भी बार-बार कार्रवाई के बावजूद अवैध उत्खनन दोबारा शुरू होने की शिकायतें गंभीर जांच की मांग करती हैं।
यदि विभागीय टीम की कार्रवाई की सूचना वास्तव में पहले ही लीक हो रही है, तो यह जांच का विषय है कि सूचना कहां से और किस माध्यम से बाहर पहुंच रही है। खनिज विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि कार्रवाई के बाद भी अवैध उत्खनन का सिलसिला क्यों नहीं थमता और क्या इस पूरे मामले में किसी स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत की जांच की गई है?
सिर्फ दबिश देना और औपचारिक कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। जरूरत ऐसी प्रभावी व्यवस्था की है, जिससे अवैध उत्खनन पर स्थायी रोक लगे और दोषियों के खिलाफ नियमानुसार कठोर कार्रवाई हो।
मुक्तिधाम का ढांचा भी खतरे में, अब आस्था और पर्यावरण दोनों पर संकट
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है कि आरोप है कि अवैध उत्खनन करने वालों ने गांव के मुक्तिधाम को भी नहीं बख्शा। इसके आसपास बड़े पैमाने पर रेत निकाले जाने से निर्माणाधीन ढांचे के कमजोर होकर गिरने की आशंका जताई जा रही है। यदि समय रहते जांच और सुरक्षा के उपाय नहीं किए गए, तो यह ग्रामीणों के लिए गंभीर समस्या बन सकता है।
एक तरफ पर्यावरण की क्षति, दूसरी तरफ सार्वजनिक संपत्ति पर संकट और तीसरी तरफ अवैध उत्खनन की लगातार शिकायतें—ये परिस्थितियां संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती हैं।
विधायक रोहित साहू ने कहा—नर्सरी का हस्तांतरण नहीं, जिम्मेदारी निभाए पंचायत
राजिम विधायक रोहित साहू ने बताया कि मामला उनके संज्ञान में है और रेत चोरी के कारण वृक्षों के गिरने की जानकारी भी उन्हें है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस नर्सरी का हस्तांतरण नहीं किया जा सकता तथा पंचायत प्रतिनिधियों को अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। अवैध रेत उत्खनन और वृक्षों की कटाई रोकने के लिए उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।
वहीं, खनिज विभाग से मिली जानकारी के अनुसार पितईबंद रेत खदान में उत्खनन पट्टा आवंटित करने के लिए निविदा आमंत्रित करने की प्रक्रिया चल रही है और इलेक्ट्रॉनिक नीलामी के प्रपत्र जारी किए गए हैं। ऐसे में यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि वर्तमान में क्षेत्र में हो रहा उत्खनन किस वैधानिक अनुमति के तहत किया जा रहा है। भविष्य में खदान का पट्टा आवंटित करने की प्रक्रिया, वर्तमान में अवैध उत्खनन की शिकायतों पर कार्रवाई का विकल्प नहीं हो सकती।
अब जवाबदेही तय हो—कौन बचाएगा महानदी तट का उजड़ता जंगल?
पितईबंद का मामला केवल रेत चोरी तक सीमित नहीं है। यह सरकारी योजनाओं से विकसित हरित संपदा, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है। हजारों वृक्षों को तैयार करने में वर्षों का समय और सरकारी संसाधन लगे, लेकिन उनके संरक्षण में कथित लापरवाही की कीमत प्रकृति को चुकानी पड़ रही है।
अब जरूरत है कि जिला प्रशासन और खनिज विभाग संयुक्त रूप से मौके का निरीक्षण करें, अवैध उत्खनन की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराएं, वृक्षों के नुकसान का आकलन करें और जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई करें। साथ ही यह भी जांच हो कि कार्रवाई की सूचना कथित तौर पर पहले ही बाहर पहुंचने की शिकायतों में कितनी सच्चाई है।
आखिर सवाल वही है—क्या खनिज विभाग रेत के अवैध कारोबार पर प्रभावी अंकुश लगाएगा, या महानदी तट पर हरियाली उजड़ती रहेगी और कार्रवाई की फाइलें धूल फांकती रहेंगी?
रेत के लालच में यदि जंगल ही उजड़ गया, तो विकास के नाम पर बचा क्या?
रिपोर्ट नेहरू साहू जिला ब्यूरो गरियाबंद








