बालोद में प्रेम प्रस्ताव ठुकराने पर एक बेटी पर एसिड फेंक दिया गया। उसका चेहरा नहीं, उसका पूरा जीवन जला दिया गया। यह खबर पढ़कर हाथ कांपते हैं। यह सिर्फ एक अपराध नहीं है, यह हमारे समाज के चेहरे पर फेंका गया तेजाब है। यह बताता है कि हमारे भीतर इंसान कितना बौना हो गया है।
और यह अकेली घटना नहीं है। कुछ दिन पहले ही एक सिरफिरे ने प्रेम में असफल होने पर एक माँ को सजा देने के लिए उसकी 4 साल की फूल सी बच्ची को ही अगवा कर लिया। सोचिए, कितनी घिनौनी सोच है। एक मासूम को मोहरा बनाकर एक माँ की ममता को तड़पाना। भला हो पुलिस का जिसने फुर्ती दिखाकर उस बच्ची को बचा लिया, वरना बदले की इस दरिंदगी में उस नन्हीं जान का क्या अंजाम होता।
लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होते। सवाल तो अब शुरू होते हैं।
क्या किसी ने सोचा है कि अगर वह बच्ची न मिलती तो उसकी माँ अपना पूरा जीवन कैसे काटती? एक-एक दिन, एक-एक रात कैसे गुजरती उसकी? और जिस बेटी पर एसिड फेंका गया, उसका क्या? वह किस मुंह से समाज में निकलेगी? उसका आगे का जीवन क्या होगा? उसकी पढ़ाई, उसकी नौकरी, उसके सपने… सब कुछ तो एक पल में राख हो गया।
यहीं पर मन में एक टीस उठती है और एक ही सवाल बार-बार गूंजता है –
क्या सारे दर्द, सारी पीड़ा, सारे आँसू सिर्फ नारी के ही हिस्से में आए हैं? क्या सजा भुगतने के लिए हर बार सिर्फ वही बनी है?
सोचने वाली बात है। मानसिकता विकृत पुरुष की है, अहंकार पुरुष का आहत होता है, वह ‘ना’ सुन नहीं पाता, लेकिन उसकी कीमत चुकाती है एक बेकसूर लड़की। आखिर क्यों?
क्या नारी इंसान नहीं है? क्या उसका दिल नहीं धड़कता? क्या उसे अपनी जिंदगी का फैसला लेने का, किसी को ‘ना’ कहने का हक नहीं है? क्या उसका ‘ना’ इतना कमजोर है कि उसे तेजाब और अपहरण से कुचला जाएगा?
हम प्रेम की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। हम राधा-कृष्ण के प्रेम की मिसाल देते हैं, जहाँ बिना मिले भी उम्र भर का समर्पण था। हम मीरा के प्रेम को पूजते हैं, जहाँ पाने की चाह नहीं थी। हम राम-सीता के प्रेम को आदर्श मानते हैं, जहाँ हर तूफान में साथ था। हम शिव-पार्वती के प्रेम की बात करते हैं, जहाँ प्रेम के लिए कठोर तपस्या थी।
उनमें से किसी में भी जोर-जबरदस्ती नहीं थी, बदला नहीं था, हिंसा नहीं थी। फिर आज का यह कैसा प्रेम है, जो न मिले तो जान ले ले, चेहरा जला दे, मासूम को अगवा कर ले?
अब वक्त आ गया है कि हम आईना देखें। सरकार कानून सख्त करे, फांसी से भी बड़ी सजा तय करे, लेकिन असली बदलाव घर से शुरू होगा। हमें अपने बेटों को सिखाना होगा कि प्रेम का मतलब पाना नहीं, सम्मान करना होता है। उसे सिखाना होगा कि एक लड़की का ‘ना’ उसकी हार नहीं, उसकी स्वतंत्रता है।
जब तक यह विकृत सोच नहीं बदलेगी, तब तक हम हर दिन किसी न किसी बेटी के जलने, किसी माँ के तड़पने की खबर पढ़ते रहेंगे।







