कटनी
कटनी | सरकार का दावा था कि हर ग्रामीण घर तक साफ और ताजा पेयजल पहुंचेगा। “हर घर जल” का सपना दिखाकर नल-जल योजना की नींव रखी गई, करोड़ों रुपये के बजट स्वीकृत हुए और गांव-गांव में बड़ी-बड़ी पानी की टंकियां बनाने का काम शुरू हुआ। लेकिन मध्य प्रदेश के कटनी जिले की तहसील ढीमरखेड़ा में जमीनी हकीकत इस सरकारी दावे के ठीक उलट है। यहां नल-जल योजना विकास की मिसाल बनने के बजाय प्रशासनिक लापरवाही, ठेकेदारों की मनमानी और बड़े स्तर पर हुए कथित भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। ढीमरखेड़ा तहसील के अधिकांश गांवों में नल-जल योजना का हाल बेहाल है। कई गांवों में सालों बीत जाने के बाद भी पानी की टंकियों का निर्माण कार्य अधूरा पड़ा है। जहां टंकियां बन भी गई हैं, वहां उनकी गुणवत्ता इतनी घटिया है कि वे सफेद हाथी साबित हो रही हैं। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों की सांठ-गांठ के कारण योजना में जमकर फर्जीवाड़ा हुआ है। ठेकेदारों ने आधा-अधूरा काम करके पूरा बिल भुगतान उठा लिया और जनता आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही है।
जहां टंकियां बनी ही नहीं, वहां उखड़ी पड़ी हैं सड़कें
ढीमरखेड़ा तहसील की कई ग्राम पंचायतों में योजना की शुरुआत बड़े ढोल-नगाड़ों के साथ हुई थी। गांव-गांव में जेसीबी चलाकर गलियों और पक्की सड़कों को खोद दिया गया ताकि पाइपलाइन बिछाई जा सके। लेकिन पाइप बिछाने के बाद न तो सड़कों की मरम्मत की गई और न ही पानी की टंकी का निर्माण पूरा हुआ। कई गांवों में स्थिति यह है पानी की टंकियों के लिए सिर्फ सीमेंट के पिलर खड़े करके छोड़ दिए गए हैं। लोहे की सरिया बाहर निकलकर जंग खा रही हैं। पाइपलाइन डालने के नाम पर गांव की मुख्य सड़कें और गलियां खोद दी गईं। बारिश के मौसम में इन गड्ढों में कीचड़ भर जाता है, जिससे राहगीर और बच्चे हादसों का शिकार हो रहे हैं। काम आधा छोड़कर ठेकेदार गायब हैं। ग्रामीणों द्वारा पूछे जाने पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलता।
जहां टंकियां बनीं, वहां ‘शो-पीस’ और भ्रष्टाचार की लीकेज
जिन गांवों में कागजों पर योजना को “पूर्ण” घोषित कर दिया गया है और जहां पानी की टंकियां खड़ी दिखती हैं, वहां की कहानी और भी चौंकाने वाली है। बनी हुई टंकियों में घटिया सीमेंट और मानक के विपरीत सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। पहली ही टेस्टिंग में कई टंकियों से पानी का रिसाव (लीकेज) शुरू हो गया। नियमानुसार टंकी बनने के बाद उसकी वाटर-प्रूफिंग और प्रेशर टेस्टिंग होना अनिवार्य है, लेकिन अफसरों ने मेज पर बैठकर ही फर्जी कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी कर दिए और ठेकेदारों का भुगतान क्लियर कर दिया। गांवों में घरों के बाहर टोटी (नल) तो लगा दी गई है, लेकिन उनमें आज तक पानी की एक बूंद नहीं आई। ग्रामीण तंज कसते हुए कहते हैं कि “सरकार ने नल तो दे दिया, लेकिन उसमें पानी डालना भूल गई।”
अफसरों और ठेकेदारों की सांठ-गांठ का ‘खेल’
ढीमरखेड़ा में नल-जल योजना के फ्लॉप शो के पीछे सीधे तौर पर विभागीय अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच की साठ-गांठ को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। योजना की लागत का एक बड़ा हिस्सा कमीशनबाजी की भेंट चढ़ गया, जिसके कारण ठेकेदारों ने गुणवत्ता से भारी समझौता किया। योजना को पूरा करने की समय सीमा कब की बीत चुकी है, लेकिन जिम्मेदार PHE विभाग के इंजीनियरों ने ठेकेदारों पर न तो कोई जुर्माना लगाया और न ही उन्हें ब्लैकलिस्ट किया।कागजों में पाइपलाइन की लंबाई अधिक दिखाकर और घटिया पाइप का इस्तेमाल कर लाखों रुपये का अतिरिक्त आहरण किया गया।
बूंद-बूंद पानी को तरसती जनता का फूटा गुस्सा
पूरी गर्मी में ढीमरखेड़ा में पेयजल की दिक्कत थीं। जिन ग्रामीणों को उम्मीद थी कि इस बार उन्हें कुओं और हैंडपंपों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे, वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। गांव की महिलाओं का कहना है कि उन्हें आज भी 1 से 2 किलोमीटर दूर झिरिया (छोटे जल स्रोतों), कुओं या खेतों में लगे ट्यूबवेल से पीने का पानी सिर पर ढोकर लाना पड़ता है। कई गांवों में हैंडपंप भी फ्लोराइड युक्त या लाल पानी उगल रहे हैं, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
ग्रामीणों ने कई बार तहसील मुख्यालय और जिला कलेक्टर कार्यालय में शिकायतें कीं, ज्ञापन सौंपे, लेकिन हर बार केवल आश्वासन का झुनझुना ही पकड़ाया गया।
✍️पुलिसवाला न्यूज़ कटनी से संभाग ब्यूरो पारस गुप्ता की रिपोर्ट







