डिंडौरी मध्यप्रदेश
रिपोर्ट अखिलेश झारिया
13.59 लाख की पुलिया में गुणवत्ता और भुगतान की अनियमितता; उपयंत्री-सहायक यंत्री की भूमिका पर भी उठे सवाल
डिंडौरी। जनपद पंचायत करंजिया की ग्राम पंचायत सैनगुड़ा अंतर्गत ग्राम सैरहा में शिवनार नाले पर निर्मित पुलिया में गुणवत्ता और भुगतान संबंधी अनियमितता सामने आने के बाद जिला पंचायत प्रशासन ने पंचायत सचिव शंकर आर्मो को निलंबित कर दिया है। जिला पंचायत सीईओ दिव्यांशु चौधरी की इस कार्रवाई के बाद अब एक अहम सवाल तकनीकी अमले की जवाबदेही को लेकर भी खड़ा हो रहा है। सवाल यह है कि जब निर्माण कार्य निर्धारित तकनीकी दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं पाया गया, तो निर्माण की तकनीकी निगरानी और मूल्यांकन से जुड़े अधिकारियों की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी?
जिला पंचायत द्वारा जारी जानकारी के अनुसार शिवनार नाले पर पुलिया निर्माण के लिए कुल 13.59 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी। इसमें 1.91 लाख रुपये मजदूरी और 11.68 लाख रुपये सामग्री मद के लिए निर्धारित थे। शिकायत की जांच में निर्माण कार्य निर्धारित तकनीकी दिशा-निर्देशों के विपरीत कराए जाने के साथ ही मजदूरी मद से राशि व्यय करने तथा मनरेगा पोर्टल पर भुगतान संबंधी प्रविष्टियों में भी अनियमितता सामने आई।
सचिव को नोटिस के बाद निलंबन*
मामले में पंचायत सचिव शंकर आर्मो को 28 अगस्त को कारण बताओ सूचना पत्र जारी कर स्पष्टीकरण मांगा गया था। प्रशासन के मुताबिक सचिव द्वारा प्रस्तुत जवाब संतोषजनक और समाधानकारक नहीं पाया गया। इसके बाद निर्माण कार्य में लापरवाही, कर्तव्य के प्रति उदासीनता और वित्तीय अनियमितता के आधार पर मध्यप्रदेश पंचायत सेवा (अनुशासन तथा अपील) नियम, 1999 के प्रावधानों के तहत उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया।
निलंबन अवधि में सचिव का मुख्यालय जनपद पंचायत करंजिया निर्धारित किया गया है और उन्हें नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता दिया जाएगा।
गुणवत्ता में खामी तो तकनीकी निगरानी की जवाबदेही किसकी?*
सचिव के खिलाफ हुई कार्रवाई के बीच पूरे मामले का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। किसी शासकीय निर्माण की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में पंचायत स्तर की प्रशासनिक प्रक्रिया के साथ तकनीकी निरीक्षण और मूल्यांकन की भी भूमिका होती है। ऐसे में यदि जांच में पुलिया का निर्माण ही निर्धारित तकनीकी दिशा-निर्देशों के विपरीत पाया गया है, तो संबंधित तकनीकी अमले की भूमिका की भी समान गंभीरता से जांच और जवाबदेही तय किए जाने की अपेक्षा स्वाभाविक है।
जानकारी के मुताबिक मामले में संबंधित उपयंत्री और सहायक यंत्री को नोटिस जारी किया गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जांच में तकनीकी अनियमितता सामने आने के बावजूद फिलहाल सचिव पर ही निलंबन की कार्रवाई क्यों हुई और तकनीकी अधिकारियों के मामले में कार्रवाई नोटिस तक क्यों सीमित है?
क्या तकनीकी स्वीकृति और मूल्यांकन की भी होगी जांच?
मामला केवल राशि के भुगतान तक सीमित नहीं है। जांच में निर्माण की गुणवत्ता और तकनीकी दिशा-निर्देशों के पालन पर भी सवाल सामने आए हैं। इसलिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि पुलिया निर्माण के दौरान किस अधिकारी ने तकनीकी निरीक्षण किया, कार्य का मूल्यांकन किस आधार पर हुआ और भुगतान से पहले निर्माण की गुणवत्ता की पुष्टि किस स्तर पर की गई।
यदि निर्माण मानकों के अनुरूप नहीं था तो संबंधित स्तर पर समय रहते इसे रोका क्यों नहीं गया? और यदि कार्य का मूल्यांकन अथवा सत्यापन किया गया था तो खामियां उस समय क्यों नहीं पकड़ी गईं? ये सवाल अब प्रशासन की आगे की जांच और कार्रवाई से जुड़े हैं।
सिर्फ सचिव तक सीमित रहेगी कार्रवाई या तय होगी सभी की जवाबदेही?
जिला पंचायत प्रशासन ने सचिव को निलंबित कर कार्रवाई का स्पष्ट संदेश दिया है, लेकिन मामले की पूरी जवाबदेही तय होना अभी बाकी दिखाई देती है। संबंधित उपयंत्री और सहायक यंत्री को जारी नोटिस पर क्या जवाब मिलता है और प्रशासन उस पर क्या निर्णय लेता है, यह महत्वपूर्ण होगा।
क्योंकि जब सवाल सरकारी धन से बनी पुलिया की गुणवत्ता का हो, तो जवाबदेही केवल कागजी प्रक्रिया संभालने वाले कर्मचारी तक सीमित न रहकर निर्माण की तकनीकी निगरानी, मूल्यांकन और सत्यापन से जुड़े प्रत्येक जिम्मेदार स्तर तक तय होना जरूरी है। तभी यह स्पष्ट होगा कि कार्रवाई निष्पक्ष रूप से जिम्मेदारी के आधार पर की गई है और किसी स्तर को अनावश्यक संरक्षण नहीं दिया जा रहा।







