डिंडौरी मध्यप्रदेश
रिपोर्ट अखिलेश झारिया
डिंडौरी के पंकू टोला की तस्वीर ने खड़े किए सवाल; पक्की सड़क नहीं होने से गांव तक नहीं पहुंच सका चार पहिया वाहन, ग्रामीण बोले—आखिर कब मिलेगी बुनियादी सुविधा
डिंडौरी/करंजिया। जिले में विकास और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं गांव-गांव तक पहुंचाने के तमाम दावों के बीच करंजिया जनपद क्षेत्र के पंकू टोला से सामने आई तस्वीर जमीनी हकीकत की अलग कहानी बयां कर रही है। यहां पक्की सड़क के अभाव में बीमार बुजुर्ग महिला को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को खटिया को ही ‘एंबुलेंस’ बनाना पड़ा। महिला को खटिया पर लिटाकर ग्रामीण कई किलोमीटर पैदल मुख्य मार्ग की ओर लेकर चले, जहां से आगे अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था की जा सकी।
यह स्थिति केवल आवागमन की परेशानी तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव में सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के अभाव और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
तीन दिन से अस्वस्थ थीं कमला, वाहन गांव तक पहुंचना मुश्किल
ग्रामीणों के अनुसार पंकू टोला निवासी बुजुर्ग कमला बांधव पिछले तीन दिनों से काफी अस्वस्थ थीं। घर पर स्वास्थ्य में सुधार नहीं होने के बाद परिजनों ने उन्हें उपचार के लिए स्वास्थ्य केंद्र ले जाने का निर्णय लिया, लेकिन रास्ते की बदहाल स्थिति बड़ी बाधा बन गई।
ग्रामीणों का कहना है कि गांव तक चार पहिया वाहन पहुंचने की स्थिति नहीं होने के कारण मरीज को सीधे वाहन से अस्पताल ले जाना संभव नहीं था। आखिरकार परिजन और ग्रामीण खटिया लेकर पहुंचे। बुजुर्ग महिला को उस पर लिटाया गया और ग्रामीण कंधों पर खटिया उठाकर मुख्य मार्ग की ओर निकल पड़े।
सड़क होती तो मरीज के दरवाजे तक पहुंच सकता था वाहन
पंकू टोला की यह तस्वीर व्यवस्था से एक सीधा सवाल करती है—जब आपात स्थिति में मरीज के घर तक वाहन ही नहीं पहुंच सकता तो ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की सहज उपलब्धता का दावा कितना कारगर है?

एक ओर स्वास्थ्य सुविधाओं और ग्रामीण विकास को अंतिम छोर तक पहुंचाने की बात की जाती है, दूसरी ओर पंकू टोला जैसे गांवों में मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने से पहले ग्रामीणों को सड़क की चुनौती से जूझना पड़ रहा है। किसी गंभीर मरीज, गर्भवती महिला, बुजुर्ग या बच्चे के लिए ऐसी परिस्थिति बेहद जोखिमपूर्ण हो सकती है।
ग्रामीणों का दावा—पहले भी भारी कीमत चुका चुका है गांव
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की समस्या वर्षों पुरानी है और इसका खामियाजा गांव के लोगों को पहले भी भुगतना पड़ा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक कुछ वर्ष पहले समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाने की परिस्थिति में गांव की एक महिला के करीब 50 वर्षीय पति और लगभग 20 वर्षीय बेटे की मौत हो गई थी। ग्रामीण इस घटना को सड़क और समय पर परिवहन सुविधा नहीं मिलने से जोड़ते हैं।
हालांकि ग्रामीणों के इस दावे की आधिकारिक स्तर पर पुष्टि होना बाकी है, लेकिन वर्तमान में मरीज को खटिया से मुख्य मार्ग तक पहुंचाने की नौबत गांव में आवागमन की गंभीर समस्या को जरूर सामने लाती है।
बारिश आते ही और मुश्किल हो जाता है अस्पताल का रास्ता
स्थानीय निवासी आनंद, कृष्णा, मधुरा, पूनम, गंगा, कमला सहित अन्य ग्रामीणों के अनुसार बारिश के दिनों में हालात और खराब हो जाते हैं। रास्ता खराब होने के कारण सामान्य आवागमन भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में यदि रात के समय कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार हो जाए या किसी गर्भवती महिला को तत्काल अस्पताल पहुंचाने की जरूरत पड़े तो परेशानी कई गुना बढ़ जाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क नहीं होने का असर केवल स्वास्थ्य सेवाओं पर नहीं, बल्कि रोजमर्रा के आवागमन और अन्य आवश्यक सेवाओं तक उनकी पहुंच पर भी पड़ रहा है।
सवाल सड़क का ही नहीं, समय पर इलाज तक पहुंच का भी
पंकू टोला की घटना प्रशासन और संबंधित विभागों के सामने दोहरी चुनौती रखती है। पहली, गांव को सुगम सड़क संपर्क उपलब्ध कराने की और दूसरी, यह सुनिश्चित करने की कि आपात स्थिति में ग्रामीणों को मरीज को खटिया पर ढोकर वाहन तक न पहुंचाना पड़े।
सड़क और स्वास्थ्य दोनों ही मूलभूत जरूरतों से जुड़े विषय हैं। ऐसे में गांव तक एंबुलेंस अथवा अन्य चार पहिया वाहन नहीं पहुंच पाने की स्थिति संबंधित विभागों के लिए समीक्षा का विषय है।
ग्रामीणों की गुहार—अधिकारी गांव आकर देखें जमीनी हालात
पंकू टोला के ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और संबंधित विभाग से गांव का मौके पर निरीक्षण कराने और पक्की सड़क निर्माण की दिशा में ठोस पहल करने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि कागजों और बैठकों से अलग अधिकारी गांव पहुंचकर स्वयं देखें कि आपात स्थिति में मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए उन्हें किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है।
अब सवाल यह है कि पंकू टोला के ग्रामीणों को सड़क के लिए आखिर और कितना इंतजार करना होगा? खटिया पर मरीज को ढोते ग्रामीणों की यह तस्वीर केवल एक बीमार बुजुर्ग की परेशानी नहीं, बल्कि उस बुनियादी सुविधा की मांग है जिसके अभाव में अस्पताल तक पहुंचने का सफर भी ग्रामीणों के लिए चुनौती बना हुआ है।







