*’ 4398 दिन बनाम 4399 दिन नॉट आउट ‘*
*’ रिकॉर्ड बनते ही हैं , टूटने के लिए ‘*
लेखक राकेश झा मंडला
पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया में हलचल मची हुई थी । राहुल गांधी सहित सम्पूर्ण कांग्रेस विचिलित थी । मुद्दा कुछ ख़ास न होते हुए भी कांग्रेसियों को कचोटने वाला था । वैसे देखा जाए तो यह मुद्दा ‘ न सूत ना कपास , जुलाहों में लठ्ठम लठ्ठा ‘ वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा था । मुद्दा 4398 बनाम 4399 का । आम जनता को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था । लेकिन , राजनीतिक गर्मा-गर्मी ने इसे आम जनता के लिए रुचिकर बना दिया । स्वतंत्र भारत में प्रधानमंत्री के पद पर सबसे अधिक समय तक बने रहने का रिकॉर्ड पंडित जवाहर लाल नेहरू के नाम था । नई – नई आजादी मिली थी । महात्मा गांधी के पश्चात देश में सबसे बड़ा नाम पंडित नेहरू का था । चूंकि , सरदार पटेल , डॉ राजेन्द्र प्रसाद जैसे अन्य नामचीन लोग राजनीतिक रूप से सत्ता के लिए ललायित नहीं थे , उनका लक्ष्य देश को गुलामी की जंज़ीरों से स्वतंत्र करवाने का था । लक्ष्य में सफलता मिल चुकी थी । उक्त वर्णित नेताओं की किसी तरह की राजनीतिक महत्वकांक्षा नहीं थी । दूसरी ओर पंडित नेहरू बड़े परिवार के चिराग थे । पारिवारिक रुतबा और रुआब के बीच बढ़े – पले । सत्ता की ताक़त का महत्व समझने वाले पंडित नेहरू को महात्मा गांधी का साथ था । आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनने की ज़िद और उसके फलस्वरूप देश के बंटवारे का दंश जनता ने सहा । पंडित नेहरू का व्यक्तित्व दिनों दिन बढ़ता गया । कमजोरियों को छुपाकर , उनकी अच्छाईयों का बखान किया जाता रहा है । लगातार तीन बार प्रधानमंत्री पद पर आसीन पंडित नेहरू मृत्यु तक प्रधानमंत्री बने रहे । उनका यह कार्यकाल 4398 दिनों तक निर्द्वन्द चलता रहा । उसके पश्चात देश की राजनीतिक परिस्थितियां बदलती चली गई । विपक्षी पार्टियों का प्रभुत्व क्रमशः बढ़ने लगा । श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल विपक्षी दलों के लिए काल बन गया था । लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आव्हान पर 1977 के लोकसभा चुनावों में समस्त विपक्षी दलों का विलय कर जनता पार्टी का उदय । कांग्रेस की पराजय और उसके पश्चात जनता पार्टी में फूट । फलस्वरूप मध्यावधि चुनावों में कांग्रेस की पुनः विजय । ये ऐसे राजनीतिक घटनाक्रम थे , जिन्होंने किसी भी प्रधानमंत्री को स्थायित्व नहीं दिया । सन 2004 में मनमोहन सिंह ऐसे प्रधानमंत्री बने जिन्होंने दो पंचवर्षीय कार्यकाल लगातार पूर्ण किये । यह इंदिरा गांधी के बाद पहली बार हुआ था ।
फिर आया 2014 का लोकसभा चुनाव , जिसने इतिहास बनाना प्रारम्भ किया । नरेंद्र मोदी पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बने । हालांकि सरकार को एनडीए की सरकार ही कहा गया , लेकिन भाजपा को पहली बार लोकसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ था । नरेंद मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में जो सफ़र 2014 में प्रारंभ हुआ था , वो आज भी जारी है । जून 10 , 2026 के दिन नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में 4399 दिन पूर्ण कर लिए ।
इस बात को अनावश्यक रूप से आवश्यकता से अधिक तूल दिया जा रहा है । कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष जहाँ इस उपलब्धि को नकारते हुए नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत टिप्पणियां कर रहा है , वहीं दूसरी ओर भाजपा और उसके सहयोगी दल इसे महान उपलब्धि साबित करने में लगे हुए हैं । सही मायने में देखा जाए तो यह राजनीतिक दलों का दिमागी दिवालियापन है । पंडित नेहरू जब प्रधानमंत्री बने उस वक्त देश की परिस्थितियां कुछ और थीं । जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने उस समय देश और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां कुछ और थीं । पंडित नेहरू के समय विपक्षी दलों और नेताओं की विचारधारा और सोच कुछ और थी । नरेंद्र मोदी के समय विपक्षी दलों और नेताओं की विचारधारा और सोच कुछ और है । पंडित नेहरू और नरेंद्र मोदी की तुलना करना बिलकुल अनुचित है । दो व्यक्तियों के कार्य करने के तरीके समय और परिस्थितियों पर निर्भर होते हैं । उनके निर्णय लेने की क्षमता और उसके दूरगामी परिणाम उनके व्यक्तित्व को स्थापित करती है । पंडित नेहरू के द्वारा लिए गए निर्णयों की समीक्षा की जा सकती है , लेकिन जो निर्णय आज नरेंद्र मोदी ले रहे हैं , उनकी समीक्षा दस – पन्द्रह वर्षों पश्चात सम्भव है । 2014 के कार्यकाल में उनके द्वारा लिए गए निर्णयों के परिणाम ही देश को आज अंतर्राष्ट्रीय पटल पर हर क्षेत्र में मजबूती के साथ खड़ा रख पाने में सफल हुए हैं । भले ही विपक्षी दल के नेता विरोध स्वरूप उसमें खामियां निकालते रहें । किन्तु , सत्य यही है , कि विपक्षी दल के नेता आज तक अपने किसी भी आरोप को सही साबित कर पाने में सफल नहीं हुए हैं । पंडित जवाहर लाल नेहरू का प्रधानमंत्री के रूप में सबसे लंबे समय तक देश का प्रतिनिधित्व करने का रिकॉर्ड टूट गया , तो इस बात को कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों को यह सहर्ष स्वीकार करना चाहिए । क्योंकि , रिकॉर्ड बनते ही हैं , टूटने के लिए ।
मंडला से अशोक मिश्रा की रिपोर्ट







