शहडोल मध्य प्रदेश
रेत माफियाओं का खेल उजागर: कम रेत, ज्यादा वसूली से जनता ठगी का शिकार, प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग
शहडोल। जिले में रेत कारोबार को लेकर एक बड़ा और गंभीर मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था और खनन तंत्र पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आम नागरिकों के साथ खुलेआम धोखाधड़ी किए जाने के आरोपों ने पूरे क्षेत्र में आक्रोश का माहौल बना दिया है। घेरोला मोहल्ला निवासी समाजसेवी अशरफ खान द्वारा कलेक्टर को सौंपे गए शिकायत पत्र में रेत कारोबार से जुड़े कई चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि किस तरह सुनियोजित तरीके से जनता को ठगा जा रहा है।
शिकायत के अनुसार, जिले में संचालित रेत की गाड़ियों और डंपरों में से लगभग 70 प्रतिशत गाड़ियां ग्राहकों को तय मात्रा से कम रेत देकर धोखाधड़ी कर रही हैं। आमतौर पर ग्राहकों को 180 से 200 घनफीट रेत देने का दावा किया जाता है, लेकिन वास्तविकता में मात्र 130 घनफीट के आसपास ही रेत उपलब्ध कराई जाती है। इस अंतर से साफ है कि हर ट्रिप में ग्राहकों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
इस पूरे खेल का सबसे चिंताजनक पहलू गाड़ियों में की जा रही तकनीकी हेराफेरी है। शिकायत में बताया गया है कि डंपरों की बॉडी के अंदर लोहे की चादर और एंगल की पट्टियां लगाकर उनकी वास्तविक क्षमता को कम कर दिया जाता है। गाड़ी बाहर से पूरी भरी हुई और सामान्य आकार की दिखाई देती है, लेकिन अंदर की जगह कम होने के कारण उसमें कम रेत भरी जाती है। यह एक सोची-समझी साजिश के तहत किया जा रहा फर्जीवाड़ा है, जिससे आम लोगों को भ्रमित कर पूरा पैसा वसूला जा सके।
जब कोई ग्राहक गाड़ी खाली करवाकर रेत की माप करता है, तब जाकर इस धोखाधड़ी का खुलासा होता है। लेकिन अधिकांश लोग ऐसा नहीं कर पाते, जिससे यह गोरखधंधा लंबे समय से बिना रोक-टोक जारी है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और अनजान उपभोक्ताओं को इस ठगी का सबसे ज्यादा शिकार बनाया जा रहा है।
शिकायत में एक और बड़ा खुलासा हाईवा और ट्रॉली सिस्टम को लेकर किया गया है। आरोप है कि रेत व्यापारी पहले हाईवा से रेत लाकर एक स्थान पर डंप कर देते हैं और फिर उसी रेत को छोटी-छोटी ट्रॉलियों में भरकर अलग-अलग ग्राहकों को बेचा जाता है। एक ही हाईवा की रेत को 5 से 6 बार तक बेचा जाता है, जिससे मुनाफा कई गुना बढ़ जाता है। यह तरीका न सिर्फ अवैध है बल्कि सीधे तौर पर उपभोक्ताओं के साथ आर्थिक शोषण भी है।
कीमत को लेकर भी बड़ा खेल सामने आया है। शिकायत के अनुसार, जिस रेत की वास्तविक कीमत लगभग 5000 रुपये होनी चाहिए, उसके लिए आम लोगों से 8000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। यानी उपभोक्ताओं को कम मात्रा देने के साथ-साथ उनसे अधिक कीमत भी ली जा रही है। इस दोहरी मार से गरीब और मध्यम वर्ग के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, जो अपने जीवन की जमा पूंजी से घर बनाने का सपना देखते हैं।
समाजसेवी अशरफ खान ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से मांग की है कि जिले में चल रही सभी रेत गाड़ियों, विशेषकर 912 मॉडल डंपरों की व्यापक जांच कराई जाए। साथ ही दोषी व्यापारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए उनके लाइसेंस निरस्त किए जाएं और भविष्य में इस तरह की धोखाधड़ी पर पूरी तरह रोक लगाई जाए।
इस मामले की जानकारी जिला खनिज विभाग और नाप-तौल विभाग के अधिकारियों को भी दी गई है, ताकि संयुक्त रूप से कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके। बावजूद इसके, अब तक किसी ठोस कार्रवाई के संकेत नहीं मिलने से लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
यह मामला न केवल अवैध खनन और व्यापार की ओर इशारा करता है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही को भी उजागर करता है। सवाल यह उठता है कि इतने बड़े स्तर पर हो रही इस धोखाधड़ी की जानकारी संबंधित विभागों को पहले क्यों नहीं हुई, या यदि हुई तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
फिलहाल, पूरे जिले की नजरें प्रशासन पर टिकी हैं। जनता यह जानना चाहती है कि क्या इस शिकायत पर गंभीरता से कार्रवाई होगी या फिर रेत माफियाओं का यह खेल यूं ही चलता रहेगा। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और भी विकराल रूप ले सकती है, जिसका खामियाजा सीधे तौर पर आम नागरिकों को भुगतना पड़ेगा।
अजय पाल







