डिंडौरी मध्यप्रदेश
रिपोर्ट अखिलेश झारिया

तीन पंचायतों में शासकीय राशि के कथित दुरुपयोग की शिकायत पर सीईओ ने दिए थे जांच के आदेश, अब जांच की स्थिति पर उठे सवाल

डिंडौरी/शहपुरा। जनपद पंचायत शहपुरा क्षेत्र की तीन ग्राम पंचायतों में शासकीय राशि के कथित दुरुपयोग और निर्माण कार्यों में अनियमितता की शिकायत पर शुरू हुई जांच करीब 17 माह बाद भी सवालों में घिरी हुई है। जनपद पंचायत क्षेत्र क्रमांक-06 की सदस्य शांति धुर्वे की शिकायत पर मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने 2 अप्रैल 2025 को संबंधित अधिकारियों को बिंदुवार जांच कर एक सप्ताह के भीतर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। लेकिन निर्धारित सात दिन की समय-सीमा के मुकाबले करीब 17 माह गुजरने के बाद भी जांच रिपोर्ट और उस पर हुई कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है।

मामला ग्राम पंचायत ढोंढा-बिलगांव, पिपरिया और मालपुर से जुड़ा बताया गया है। शिकायत में 15वें वित्त आयोग, मनरेगा सहित विभिन्न शासकीय मदों से कराए गए कार्यों और राशि के उपयोग को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए थे। हालांकि शिकायत में लगाए गए आरोपों की सत्यता जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

सीईओ का आदेश स्पष्ट, फिर जांच रिपोर्ट में इतनी देरी क्यों?

उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार जनपद सदस्य शांति धुर्वे ने 25 मार्च 2025 को शिकायत प्रस्तुत की थी। इसके संदर्भ में जनपद पंचायत शहपुरा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने 2 अप्रैल 2025 को पत्र क्रमांक 42 जारी किया। पत्र में शिकायत के बिंदु क्रमांक 1 से 4 तक की बिंदुवार जांच कर एक सप्ताह के भीतर जांच प्रतिवेदन कार्यालय में प्रस्तुत करने के निर्देश संबंधित अधिकारियों को दिए गए थे।

अब इसी आदेश की समय-सीमा प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही है। सात दिन में जिस जांच को पूरा कर प्रतिवेदन मांगा गया था, उसकी स्थिति करीब 17 माह बाद भी स्पष्ट नहीं होना कई सवाल पैदा करता है। जांच पूरी हुई तो रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई हुई और यदि जांच अब भी लंबित है तो इतनी देरी का कारण क्या है?

नाली, नलजल और ग्रेवल रोड के कार्यों पर उठाए गए थे सवाल

शिकायत में ग्राम पंचायत बिलगांव में वर्ष 2022-23 के दौरान 15वें वित्त आयोग की राशि से नाली निर्माण के लिए राशि उपलब्ध होने के बावजूद निर्माण नहीं कराए जाने का आरोप लगाया गया था।

ग्राम पंचायत पिपरिया में वर्ष 2021-22 के दौरान नलजल विस्तारीकरण के लिए मिली राशि के साथ तालाब, शौचालय और ग्रेवल रोड से संबंधित कार्यों में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि ग्रेवल रोड में निर्धारित कार्य के स्थान पर केवल एक परत का काम कराकर राशि का भुगतान किया गया।

ढोंढा में बॉउंड्रीवाल और मनरेगा कार्यों को लेकर शिकायत

ग्राम पंचायत ढोंढा को लेकर शिकायत में बॉउंड्रीवाल से संबंधित कार्य के नाम पर बिना निर्माण कराए राशि आहरित किए जाने का आरोप लगाया गया था। इसके अलावा मनरेगा के तहत वृक्षारोपण, कंटूर ट्रेंच और गली प्लग जैसे कार्यों में सामग्री एवं परिवहन के नाम पर कथित फर्जी बिलों के जरिए भुगतान कराने की शिकायत भी की गई थी।

इन आरोपों की वास्तविकता क्या है, इसका निष्कर्ष जांच से ही सामने आ सकता है। ऐसे में जांच प्रतिवेदन का सामने आना शिकायतकर्ता के आरोपों के साथ संबंधित पंचायतों और जिम्मेदार अधिकारियों की स्थिति स्पष्ट करने के लिए भी महत्वपूर्ण है।

वित्त आयोग से लेकर पंचपरमेश्वर की राशि तक जांच की मांग

आवेदन में 5वें, 14वें एवं 15वें वित्त आयोग, पंचपरमेश्वर और मनरेगा के तहत कराए गए कार्यों तथा खर्च की गई राशि की जांच की मांग की गई थी। शिकायतकर्ता ने मानदेय, किराना सामग्री, कार्यालय व्यय सहित विभिन्न मदों में किए गए भुगतान और सप्लायरों के नाम पर लगाए गए कथित फर्जी बिलों की भी जांच कराने की मांग की थी।

सवाल आरोपों से आगे अब जांच व्यवस्था पर भी

मामले में अब सवाल केवल शिकायत में लगाए गए आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि जांच प्रक्रिया की समयबद्धता और जवाबदेही पर भी है। जब जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने स्वयं एक सप्ताह के भीतर जांच प्रतिवेदन मांगा था, तब करीब 17 माह बाद उसकी स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं है?

क्या संबंधित अधिकारियों ने निर्धारित समय में प्रतिवेदन सौंपा था? यदि सौंपा था तो उसके निष्कर्ष क्या थे और उस पर क्या कार्रवाई की गई? यदि प्रतिवेदन ही प्रस्तुत नहीं किया गया तो आदेश का पालन नहीं करने वालों के खिलाफ क्या कदम उठाए गए? इन सवालों का जवाब सामने आना बाकी है।

जांच रिपोर्ट सामने आए तो साफ हो तस्वीर

शिकायत में लगाए गए आरोप सही हैं अथवा गलत, इसका फैसला बिना जांच निष्कर्ष के नहीं किया जा सकता। लेकिन जांच के स्पष्ट आदेश और सात दिन की निर्धारित समय-सीमा के बावजूद करीब 17 माह बाद भी स्थिति स्पष्ट नहीं होना प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल जरूर खड़े करता है।

अब मांग है कि जनपद पंचायत प्रशासन जांच की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करे और जांच पूरी हो चुकी है तो उसका निष्कर्ष तथा की गई कार्रवाई सामने लाए। वहीं जांच लंबित होने की स्थिति में देरी के लिए जवाबदेही तय की जाए। यदि जांच में आरोप प्रमाणित होते हैं तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए और आरोप निराधार मिलते हैं तो संबंधित पंचायतों की स्थिति भी स्पष्ट की जाए।

सात दिन की जांच 17 माह में भी कहां तक पहुंची—अब इसी सवाल का जवाब प्रशासन से अपेक्षित है।

जांच टीम के सदस्य दे रहे गोलमोल जवाब, कुछ ने फोन तक नहीं उठाया

मामले में जांच की वर्तमान स्थिति जानने के लिए जब जांच टीम के सदस्यों से संपर्क कर यह जानने का प्रयास किया गया कि जांच पूरी हुई या नहीं और प्रतिवेदन अब तक कहां लंबित है, तो स्पष्ट जवाब नहीं मिल सका। बातचीत के दौरान कुछ सदस्यों ने जांच की स्थिति को लेकर गोलमोल जवाब दिए और मामले पर स्पष्ट रूप से कुछ कहने से बचते नजर आए। वहीं जांच से जुड़े उपयंत्री विकास खरे सहित अन्य संबंधितों से भी दूरभाष पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। ऐसे में सात दिन के भीतर मांगी गई जांच रिपोर्ट की वास्तविक स्थिति को लेकर असमंजस और गहरा गया है। प्रशासन की ओर से जांच की स्थिति स्पष्ट किए जाने के बाद ही यह सामने आ सकेगा कि प्रतिवेदन तैयार हुआ है या मामला अब भी जांच प्रक्रिया में लंबित है।

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