शहडोल मध्य प्रदेश
नियम ताक पर, जाम छलका रहे खास और आम
ऋषि की सफेद मार्शल से बह रही शराब की गंगा
विभाग की आंखों पर बंधी गांधी वाली पट्टी
मगरमच्छों को मिल रहा सरकारी संरक्षण
शहडोल। संभागीय मुख्यालय में इन दिनों आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली अंधेर नगरी, चौपट राजा वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है। शराब ठेकेदार को जायज-नाजायज लाभ पहुंचाने की ऐसी बेताबी शायद ही पहले कभी देखी गई हो। आलम यह है कि पूरे जिले में नियम-कानून धुआं हो रहे हैं और त्रिपाठी-ऋषि की जुगलबंदी ने शराब के कारोबार को एक ऐसे रेले में तब्दील कर दिया है, जिसमें नैतिकता और कानून दोनों बह गए हैं।
ऋषि का सफेद साम्राज्य
जिले की आबकारी फिजाओं में इन दिनों दो ही नाम गूंज रहे हैं, त्रिपाठी और ऋषि। चर्चा आम है कि त्रिपाठी जी के अभयदान तले ऋषि ने अंग्रेजी शराब की पैकारी का ऐसा जाल बुना है कि हाईवे के आलीशान ढाबों से लेकर मोहल्लों की तंग गलियों तक बोतलें खुद चलकर पहुंच रही हैं। खुद को पाक-साफ बताने वाले जिम्मेदार अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं, मानो उन्हें भ्रष्टाचार की इस गंध में मोगरे की खुशबू आ रही हो। यह अलग बात है कि जब कोई दूसरा इस खेल में उतरने की हिमाकत करता है, तो पर्दे के पीछे से वर्दी का डंडा चलवा दिया जाता है। यानी, धंधा भी अपना और डंडा भी अपना, जमुई, सिंदुरी, भर्री, अमरहा, चुनिया जैसे कई ग्रामीड इलाके से लेकर पड़ोसी जिले उमरिया की सरहदों तक ऋषि की अंग्रेजी शराब की धमक साफ़ सुनी जा सकती है।
बिना बिल के नशा परोसने का हुनर
शराब दुकानों पर नियमों की धज्जियां उड़ाना अब परंपरा बन चुकी है। कहने को दुकानों पर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, लेकिन शायद इन कैमरों को भी मोतियाबिंद हो गया है। दुकानों से सटे टपरों पर बैठकर सरेआम जाम छलकाए जा रहे हैं, लेकिन जिम्मेदारों को कुछ दिखाई नहीं देता। लगता है विभाग ने कैश मेमो (बिल) वाले नियम को इतिहास की किताबों में दफन कर दिया है। ऋषि-त्रिपाठी की इस सल्तनत में बिल मांगना मानों गुनाह-ए-अजीम हो गया है।
मिलावट का जहर
जब से त्रिपाठी और ऋषि की इस जोड़ी ने हाथ मिलाया है, शराब में मिलावट का खेल अपने चरम पर पहुंच गया है। सूत्रों की मानें तो ऋषि ने अधिकारियों की ऐसी दुखती नस दबा रखी है कि उसके खिलाफ बोलने की हिम्मत किसी में नहीं। सरकारी नुमाइंदे ठेकेदार के दरबारी बनकर रह गए हैं। पूरे क्षेत्र में सफेद रंग की मार्शल रात-दिन शराब की खेप पहुंचा रही हैं। ये गाड़ी यमराज के दूत की तरह सडक़ों पर दौड़ती हैं, जिसमें अवैध शराब का जखीरा भरा होता है, लेकिन मजाल है कि कोई जांच का साहस कर सके, विभाग इन वाहनों को एम्बुलेंस जैसी प्राथमिकता देता नजर आता है।
गरीबों पर गाज, माफिया पर नाज
आबकारी विभाग की वीरता का असली चेहरा तब दिखता है जब वे गांव के किसी भोले-भाले ग्रामीण को धर दबोचते हैं, जो अपने पीने भर के लिए शराब बनाता है। छोटे लोगों पर कार्यवाही कर विभाग अपनी पीठ तो थपथपा लेता है, लेकिन उन्हीं ग्रामीणों पर ऋषि की अंग्रेजी शराब बेचने का दबाव बनाया जाता है, यानी सरकारी संरक्षण में अवैध धंधे का विस्तार यह मंशा बनी हुई है। शहडोल की सडक़ों पर रात भर दौड़ते दोपहिया और चार पहिया वाहन साफ़ गवाही दे रहे हैं कि आबकारी विभाग और पुलिस ने अपनी आंखें मूंद ली हैं। क्या प्रशासन इस त्रिपाठी-ऋषि सिंडिकेट के आगे आत्मसमर्पण कर चुका है या फिर इस शराब की वैतरणी में सभी ऊपर से नीचे तक डुबकी लगा रहे हैं?
अजय पाल
