डिंडौरी मध्यप्रदेश
रिपोर्ट अखिलेश झारिया

शहपुरा नगर परिषद सीएमओ की खिदमत मे बिना टैक्सी परमिट की गाडी, शासन को लाखों का चूना

शहपुरा (डिंडौरी)।
नगर परिषद शहपुरा में शासकीय नियमों के खुले उल्लंघन का गंभीर मामला सामने आया है। यहां मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) की सुविधा के लिए लगाया गया वाहन बिना वैध टैक्सी (कमर्शियल) परमिट के सरकारी कार्यों में उपयोग किया जा रहा है। यह न केवल परिवहन नियमों की अवहेलना है, बल्कि शासन एवं परिवहन विभाग को प्रत्यक्ष रूप से राजस्व हानि पहुंचाने का मामला भी बनता है।
जानकारी के अनुसार, नगर परिषद शहपुरा में जिस वाहन को शासकीय टैक्सी मद के अंतर्गत संलग्न दर्शाया गया है, उसके पास वैध कमर्शियल टैक्सी परमिट नहीं है। इसके बावजूद वाहन का उपयोग नगर परिषद के अधिकारियों की आवाजाही एवं शासकीय कार्यों में लगातार किया जा रहा है, जबकि उसका भुगतान नियमित रूप से सरकारी खजाने से किया जा रहा है।

2014 के बाद लागू नियम केवल कागजों तक सीमित
गौरतलब है कि वर्ष 2014 के बाद राज्य शासन द्वारा स्पष्ट निर्देश जारी किए गए थे कि जिन शासकीय कार्यालयों के पास स्वयं के वाहन उपलब्ध नहीं हैं, वहां अधिकारियों की सुविधा हेतु केवल उन्हीं चार पहिया वाहनों को किराए पर लिया जाएगा, जिनके पास परिवहन विभाग द्वारा स्वीकृत टैक्सी परमिट, वैध फिटनेस प्रमाण-पत्र, बीमा एवं टैक्स भुगतान की संपूर्णता हो। इसके विपरीत, निजी (नॉन-कमर्शियल) वाहनों को टैक्सी मद में लगाना पूर्णतः नियम विरुद्ध है।
लेकिन नगर परिषद शहपुरा में यह नियम महज फाइलों और कागजों तक सीमित रह गए हैं। बताया जा रहा है कि लग्जरी वाहनों के शौक और सुविधा की चाह में जिम्मेदार अधिकारी नियमों को दरकिनार कर रहे हैं।

परिवहन विभाग को भी हो रही राजस्व हानि
बिना टैक्सी परमिट के वाहन के उपयोग से न केवल यातायात एवं परिवहन नियमों का उल्लंघन हो रहा है, बल्कि परिवहन विभाग को मिलने वाला टैक्स एवं अन्य शुल्क भी प्रभावित हो रहा है, जिससे शासन को प्रतिमाह लाखों रुपये की राजस्व हानि होने की आशंका है।

प्रशासनिक मिलीभगत और हितों के टकराव की आशंका
जानकारों का कहना है कि कई शासकीय विभागों में बिना टैक्सी परमिट के वाहन लगाए जाने के पीछे निजी हित भी जुड़े होते हैं। कई बार अधिकारियों या विभागीय कर्मचारियों के स्वयं के या रिश्तेदारों के वाहन किराए पर लगा दिए जाते हैं, जिससे बाहरी टैक्सी चालक या एजेंसी के आने से होने वाली पारदर्शिता से बचा जा सके। ऐसे में नियमों के उल्लंघन के साथ-साथ प्रशासनिक मिलीभगत की आशंका भी गहराती है।

जब जिम्मेदार ही नियम तोड़ें तो…
यह सवाल भी खड़ा होता है कि जब शासकीय अधिकारी ही नियमों की अवहेलना कर शासन को राजस्व क्षति पहुंचाएंगे, तो आम नागरिकों से नियम पालन की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

उठते हैं कई गंभीर सवाल
बिना टैक्सी परमिट के वाहन को नगर परिषद में किसके आदेश से लगाया गया?

भुगतान संबंधी फाइलों पर किन अधिकारियों के हस्ताक्षर हुए?

क्या सीएमओ को नियमों की जानकारी नहीं है या जानबूझकर अनदेखी की जा रही है?

शासन को हुई आर्थिक क्षति की भरपाई कौन करेगा?

क्या इस मामले में जवाबदेही तय होगी या मामला फाइलों में दबा दिया जाएगा?

यह प्रकरण केवल एक वाहन तक सीमित नहीं, बल्कि शासकीय तंत्र में व्याप्त लापरवाही, मनमानी और नियमों की अनदेखी का प्रतीक बनता जा रहा है। अब देखना यह होगा कि उच्च अधिकारी इस गंभीर मामले पर संज्ञान लेकर कार्रवाई करते हैं या फिर शासन को लगाया जा रहा चूना यूं ही जारी रहेगा।

Leave A Reply

Exit mobile version