डिंडोरी।
कंक्रीट की दुनिया से निकलकर जब नन्हे कदम हरियाली की ओर बढ़े, तो प्रकृति ने उन्हें बाहों में भर लिया। पक्षियों की चहचहाहट, पत्तों की सरसराहट और जंगल की नीरव भाषा के बीच राष्ट्रीय जीवाश्म उद्यान, घुघुवा में आयोजित प्रथम अनुभूति कार्यक्रम बच्चों के लिए केवल एक शिविर नहीं, बल्कि प्रकृति से आत्मीय संवाद बन गया।
वन मंडल डिंडोरी (सामान्य) अंतर्गत वन परिक्षेत्र शहपुरा में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में सीएम राइज उच्चतर माध्यमिक विद्यालय शहपुरा के 130 छात्र-छात्राएं पहली बार जंगल को किताबों से बाहर निकलकर महसूस करते दिखे। कार्यक्रम की शुरुआत प्रकृति वंदना के साथ हुई, मानो बच्चों ने धरती मां को नमन कर सीखने की अनुमति मांगी हो।
“मैं भी बाघ”, “हम हैं बदलाव”, “हम हैं धरती के दूत”—इन थीम्स ने बच्चों के मन में यह भाव रोप दिया कि वन्यजीव और प्रकृति कोई अलग संसार नहीं, बल्कि हम सबका साझा घर हैं। अनुभूति मास्टर ट्रेनर श्री शोभित राम बनवासी एवं अनुभूति प्रेरक श्री अमृत सिंह मसराम ने सरल शब्दों में जंगल की भाषा सिखाई—जहाँ हर पेड़ एक शिक्षक है और हर जीव एक संदेशवाहक।
प्रकृति पथ पर चलते हुए बच्चों ने सूखे पत्तों में जीवन का चक्र देखा, दीमक की बामी में परिश्रम का पाठ पढ़ा, मधुमक्खी के छत्ते से अनुशासन सीखा और बया पक्षी के घोंसले से मेहनत व सृजन की प्रेरणा ली। शाकाहारी से मांसाहारी जीवों तक की जानकारी ने उन्हें समझाया कि हर जीव का अस्तित्व इस धरती के संतुलन के लिए आवश्यक है।
दोपहर बाद साहसिक गतिविधियों, खाद्य-श्रृंखला, रोचक खेलों, क्विज, चित्रकला और पुराने कपड़ों से थैला निर्माण जैसी गतिविधियों ने बच्चों के भीतर छुपी रचनात्मकता को नया आकाश दिया। मिशन लाइफ के सिद्धांतों ने यह संदेश दिया कि पर्यावरण की रक्षा बड़े कदमों से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी आदतों से शुरू होती है।
कार्यक्रम के अंत में जब बच्चों ने पर्यावरण संरक्षण की शपथ ली और सामूहिक अनुभूति गीत गूंजा, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो जंगल ने अपने नन्हे संरक्षकों को पहचान लिया हो।
इस अवसर पर प्रदीप वासुदेवा, प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं संचालक एसएफआरआई जबलपुर, अशोक कुमार सोलंकी, वन मंडल अधिकारी डिंडोरी (सा.), सुनील कुमार अशोक, उप वनमंडल अधिकारी शहपुरा (सा.) एवं श्री जे.पी. वाष्पे, वन परिक्षेत्र अधिकारी शहपुरा सहित परिक्षेत्र का समस्त वन अमला एवं वन सुरक्षा समिति के सदस्य उपस्थित रहे।
वन विभाग की यह पहल न केवल ज्ञान का माध्यम बनी, बल्कि बच्चों के मन में संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और प्रकृति के प्रति आजीवन रिश्ता जोड़ गई—यही ‘अनुभूति’ की सबसे बड़ी सफलता रही।
डिंडौरी मध्यप्रदेश
रिपोर्ट अखिलेश झारिया
