कटनी | भारत में ग्राम पंचायतें लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने वाली सबसे अहम इकाई हैं। इन्हीं पंचायतों के माध्यम से ग्रामीण स्तर पर विकास कार्यों का संचालन होता है। सड़क, नाली, तालाब, पेयजल, शौचालय, सामुदायिक भवन जैसी मूलभूत सुविधाओं का जिम्मा पंचायत को सौंपा जाता है। सरकार हर साल इन कार्यों के लिए करोड़ों रुपये की योजनाएँ बनाती और धन आवंटित करती है। उद्देश्य यह रहता है कि गाँवों की तस्वीर बदले और आमजन को बेहतर सुविधाएँ मिलें। परंतु जब पंचायत व्यवस्था में बैठे लोग ही भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाएँ, तो न केवल धन का दुरुपयोग होता है बल्कि ग्रामीण विकास का सपना भी अधूरा रह जाता है। जनपद पंचायत बहोरीबंद के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत पटीराजा का मामला इसी सच्चाई को उजागर करता है। यहाँ के सचिव महबूब खान और सरपंच पर आरोप है कि उन्होंने सरकारी धन की बंदरबांट करने के लिए योजनाबद्ध ढंग से फर्जी बिल तैयार किए और लाखों रुपये का गबन किया।


फर्जी बिलों का खेल
मामला तब सामने आया जब यह पाया गया कि पंचायत में विकास कार्यों के नाम पर कौशल सिंह नामक दुकानदार के नाम से एक ही दिनांक और एक ही समय पर 6 अलग-अलग बिल तैयार किए गए। सामान्य परिस्थितियों में यदि वास्तविक काम होता तो हर कार्य का बिल अलग-अलग तारीख और समय पर बनता। लेकिन यहाँ पर सभी बिलों पर हस्ताक्षर, मुहर और समय की एंट्री एक जैसी थी। यही नहीं, सभी बिलों में लाभार्थी या आपूर्तिकर्ता के रूप में केवल कौशल सिंह का नाम इस्तेमाल किया गया। इसका अर्थ यह हुआ कि सचिव महबूब खान और सरपंच ने मिलकर कौशल सिंह के नाम को ढाल बनाकर एक ही दिन में कई कार्यों का भुगतान दिखा दिया। धन आहरण की प्रक्रिया पूरी कर ली गई और राशि सीधे खाते से निकाल ली गई। यह तथ्य स्पष्ट करता है कि पूरा खेल पहले से सोची-समझी साजिश के तहत हुआ। कौशल सिंह की दुकान की जी.एस.टी. पंजीयन और लेन-देन की जांच इस मामले का असली सच सामने ला सकती है।
मिलीभगत का सबूत
ग्राम पंचायत व्यवस्था में सचिव और सरपंच की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। सचिव प्रशासनिक अधिकारी होता है जबकि सरपंच जनता का निर्वाचित प्रतिनिधि। दोनों का दायित्व है कि सरकारी योजनाएँ पारदर्शी और नियमों के अनुसार लागू हों। लेकिन जब यही दोनों पदाधिकारी निजी लाभ के लिए मिल जाते हैं, तो भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।पटीराजा पंचायत का प्रकरण इसी मिलीभगत का उदाहरण है। सचिव महबूब खान ने पूरे प्रशासनिक तंत्र का दुरुपयोग करते हुए बिलों को पास किया और भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर दी। सरपंच ने इस प्रक्रिया में सहमति दी और हिस्सेदारी भी ली। इतना बड़ा फर्जीवाड़ा सरपंच की जानकारी और सहयोग के बिना संभव ही नहीं था।


फर्जीवाड़े की तकनीकी चालें
इस तरह के फर्जीवाड़े कोई नए नहीं हैं। पंचायत स्तर पर अक्सर देखा गया है कि सचिव और सरपंच दुकानदारों या ठेकेदारों से मिलकर फर्जी बिल लगाते हैं। एक ही दिनांक और समय पर सभी बिल तैयार करना, एक ही व्यक्ति के नाम पर आपूर्ति दिखाना, एक जैसी मुहर और हस्ताक्षर का इस्तेमाल करना, बैंक खाते से सीधे धन आहरण कर लेना और बाद में आपस में बांट लेना ये सभी तकनीकी तरीके भ्रष्टाचारियों के लिए “आसान रास्ता” होते हैं।
ग्रामीण जनता को नुकसान
भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा खामियाजा ग्रामीण जनता को भुगतना पड़ता है। जिन योजनाओं से गाँवों की सूरत बदलनी थी, वे अधूरी रह जाती हैं। सड़कें टूटी रहती हैं, नालियाँ अधूरी, तालाब गंदे और शौचालय अधर में लटके रहते हैं। पैसा खर्च दिखा दिया जाता है लेकिन वास्तविक कार्य या तो होता ही नहीं या नाममात्र का होता है।पटीराजा पंचायत में भी यही हुआ। सरकारी रिकॉर्ड में भुगतान दिखा दिया गया, लेकिन गाँव के लोग अब भी मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। यह न केवल आर्थिक अपराध है बल्कि सामाजिक अन्याय भी है।
कानूनी प्रावधान क्या कहते हैं?
भारत में पंचायत अधिनियम और वित्तीय नियमों में स्पष्ट प्रावधान है कि किसी भी भुगतान से पहले कार्य स्थल का निरीक्षण और सत्यापन अनिवार्य है। कार्य पूर्ण होने पर तकनीकी अधिकारी की रिपोर्ट भी जरूरी होती है। यदि कोई सचिव या सरपंच नियमों का उल्लंघन करता है और फर्जी बिल लगाता है तो उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हो सकता है।भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत यह अपराध भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है।दोषियों को जेल की सजा के साथ-साथ गबन की गई राशि की वसूली का भी प्रावधान है। साथ ही, ऐसे अधिकारी और जनप्रतिनिधियों को उनके पद से निलंबित या बर्खास्त भी किया जा सकता है।
जांच की आवश्यकता, तभी खुलेगी पोल
पटीराजा पंचायत का मामला यह दर्शाता है कि गाँव के स्तर पर भी करोड़ों रुपये के गबन आसानी से हो सकते हैं। कौशल सिंह की दुकान और उसकी जी.एस.टी. पंजीयन की जांच,पंचायत में बैंक लेन-देन और भुगतान की एंट्री का परीक्षण, कार्य स्थल पर वास्तविक निर्माण और आपूर्ति का सत्यापन, सचिव और सरपंच की मिलीभगत की पड़ताल। यदि जांच निष्पक्ष रूप से हो तो पूरा सच सामने आ जाएगा और दोषियों को कठोर दंड मिल सकेगा। ग्राम पंचायतें लोकतंत्र की नींव हैं। यदि इन्हीं में भ्रष्टाचार घर कर जाए तो ग्रामीण विकास असंभव हो जाता है। पटीराजा पंचायत का मामला बताता है कि कैसे सचिव महबूब खान और सरपंच ने मिलकर सरकारी धन को निजी लाभ के लिए लूटा ।
क्या इस पूरे लूट‌ के मामले को
नवागत जिला पंचायत सीईओ संज्ञान में लेते हुए कार्यवाही करेंगे या फिर पूरा मामला ठंडे बस्ते में ही रह जाएगा
🖋️ पुलिसवाला न्यूज़ कटनी से पारस गुप्ता की रिपोर्ट

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