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चुनाव आते ही राजनीतिक पार्टियां वोटरों को लुभाने के लिए बड़े-बड़े वादे कर देती हैं । इसे ही राजनीतिक भाषा में फ्रीबीज या रेवड़ी कल्चर कहा जाता है । कोई भी राजनीतिक दल इससे अछूता नहीं है और चुनाव आते ही रेवड़ी बाँटने की प्रतियोगिता में अव्वल रहना चाहता है।
चुनावी रेवड़ी बाँटने की प्रवृत्ति से सरकार और समाज पर कई नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं। सबसे बड़ा असर वित्तीय अस्थिरता का होता है। मुफ्त योजनाओं के कारण सरकार की आय घटती है जबकि खर्च बढ़ता है, जिससे बजट घाटा बढ़ता है और राज्य को कर्ज लेने की आवश्यकता पड़ती है। इसका नतीजा यह होता है कि राज्य के आर्थिक विकास में रुकावट आती है और उसकी वित्तीय स्थिति कमजोर हो जाती है।
मुफ्त योजनाओं के चलते सरकार को जरूरी विकासात्मक कार्यों और बुनियादी ढांचे पर खर्च घटाना पड़ता है, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर बुरा असर पड़ता है। ऐसे में राज्य की आर्थिक स्थिति और सामाजिक सेवाएं कमजोर हो जाती हैं, जिससे लोगों के जीवन स्तर में गिरावट आती है। इसके अलावा, जनता पर करों का अतिरिक्त बोझ डालने की जरूरत पड़ती है, जिससे उनकी क्रय शक्ति कम हो जाती है और समाज में आर्थिक असमानता बढ़ती है।
फ्री योजनाओं के कारण वित्तीय अनुशासन का अभाव देखने को मिलता है। लंबे समय तक, यह राज्य की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाता है, क्योंकि इन योजनाओं पर निर्भरता बढ़ने से सरकार का ध्यान उन क्षेत्रों से हट जाता है जो स्थायी विकास के लिए आवश्यक होते हैं। इससे रोजगार सृजन और निजी क्षेत्र में निवेश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था और कमजोर होती जाती है।
इसके अलावा, मुफ्त योजनाओं से लोगों में उत्पादकता और मेहनत की भावना भी कम हो जाती है। जब लोग सरकारी मुफ्त सेवाओं पर निर्भर हो जाते हैं, तो उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता में गिरावट आती है और यह समाज के विकास को धीमा कर देता है।
पंजाब और हिमाचल प्रदेश की सरकारों ने मुफ्त योजनाओं के माध्यम से चुनावी लाभ पाने की कोशिश की, लेकिन अब उन्हें यह एहसास हो रहा है कि राज्य की अर्थव्यवस्था इन योजनाओं का बोझ उठाने में असमर्थ है। स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि कर्मचारियों को वेतन और पेंशन देने में कठिनाइयाँ आ रही हैं। उदाहरण के लिए, पंजाब में मुफ्त बिजली योजनाओं से राज्य के अधिकांश लोग मुफ्त में बिजली का उपयोग कर रहे हैं, जिससे बिजली विभाग की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई है।
कैग की हालिया रिपोर्ट बताती है कि राज्य का राजस्व घाटा निर्धारित लक्ष्यों से काफी ऊपर चला गया है, और सार्वजनिक ऋण में भी वृद्धि हो रही है। अगर इस स्थिति को नियंत्रित नहीं किया गया और वित्तीय अनुशासन को बहाल नहीं किया गया, तो राज्य और गंभीर संकट में पड़ सकता है।
रेवड़ी कल्चर, यानी मुफ्त सुविधाओं और योजनाओं पर अत्यधिक निर्भरता, कई देशों की अर्थव्यवस्था को बर्बादी की ओर ले जा चुका है। इनमें प्रमुख उदाहरण हैं:
वेनेज़ुएला में मुफ्त तेल और सुविधाओं की नीति से सरकारी खजाना खाली हो गया, और तेल की कीमतें गिरने पर देश गंभीर आर्थिक संकट में फंस गया।
ग्रीस ने पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर अत्यधिक खर्च किया, जिससे भारी कर्ज हो गया और वित्तीय संकट के चलते उसे यूरोपियन यूनियन और आईएमएफ से बेलआउट लेना पड़ा।
ज़िम्बाब्वे में मुफ्त सेवाओं और सब्सिडी के कारण मुद्रा का अवमूल्यन हुआ और भारी मुद्रास्फीति से देश की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई।
अर्जेंटीना में लंबे समय तक मुफ्त सेवाओं पर खर्च से सरकारी खजाना खाली हो गया, जिससे बार-बार वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा।
श्रीलंका ने भी रेवड़ी कल्चर और खराब आर्थिक नीतियों के कारण दिवालियापन का सामना किया, जिससे आवश्यक वस्तुओं की कमी और मुद्रास्फीति ने जनता की कठिनाइयाँ बढ़ा दीं।
रेवड़ी कल्चर का अतिरेक किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर सकता है। यह नीतियां अल्पकालिक लाभ तो दे सकती हैं, लेकिन दीर्घकाल में यह आर्थिक संकट और जनता के जीवन स्तर में गिरावट का कारण बनती हैं। देश को स्थायी विकास और वित्तीय अनुशासन पर ध्यान देना चाहिए ताकि ऐसी स्थिति से बचा जा सके। इसलिए, राजनीतिक दलों को मुफ्त योजनाओं की राजनीति से बचना चाहिए और वित्तीय अनुशासन को प्राथमिकता देनी चाहिए। जनता को भी यह समझना चाहिए कि मुफ्त योजनाओं के लालच में आकर दिया गया वोट लंबे समय में उनके हितों पर भारी पड़ सकता है।सुप्रीम कोर्ट से अपेक्षा है कि सभी दलों की इस प्रवृत्ति पर कड़ाई से अंकुश लगाए।
( राजीव खरे- राष्ट्रीय उप संपादक)
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