शहडोल मध्य प्रदेश
बिना नंबर की मौत बनकर घूम रहा सफेद हाथी
त्रिपाठी-ऋषि के शराब साम्राज्य में नीलाम हुई खाकी
धृतराष्ट्र बन चुके हैं आला अफसर
वर्दी पर भारी पड़ा ब्लैकमेलिंग का सिंडिकेट
शहडोल। कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता की सरकार चलती है, लेकिन शहडोल जिला मुख्यालय से सटे दर्जनों गांवों में इन दिनों न संविधान चल रहा है और न ही कानून, यहां चलती है तो सिर्फ त्रिपाठी एंड कंपनी की समानांतर सरकार। सिंदुरी, खोल्हाड़, पचगांव, अंतरा और सिंहपुर जैसे कई इलाके आज खाकी के संरक्षण में अवैध अंग्रेजी शराब की ऐसी मंडी बन चुके हैं, जहाँ आबकारी और पुलिस के नियम नहीं, बल्कि त्रिपाठी का टैक्स तय करता है कि शाम किसकी रंगीन होगी।
बगैर नंबर की मार्शल
इन क्षेत्रों की गलियों में धूल उड़ाती एक सफेद रंग की बगैर नंबर वाली मार्शल गाड़ी इन दिनों चर्चा का केंद्र है। यह सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि त्रिपाठी के रसूख और ऋषि के आतंक का चलता-फिरता विज्ञापन है। कानून कहता है कि सडक़ पर चलने वाले हर वाहन की पहचान होनी चाहिए, लेकिन इस सफेद हाथी को रोकने की हिम्मत जिला प्रशासन के किसी भी सूरमा में नहीं है। सूत्रों की मानें तो इसी मार्शल में भरकर अवैध अंग्रेजी शराब की खेप पैकारी के लिए भेजी जाती है। जब रक्षक ही भक्षक की गाड़ी को हरी झंडी दिखाए, तो बेचारी जनता किसके पास फरियाद लेकर जाए, यह गाड़ी इस बात का प्रतीक है कि शहडोल में कानून की नंबर प्लेट उखड़ चुकी है।
ऋषि का ऑडियो ब्रह्मास्त्र
इस पूरे खेल का सबसे घिनौना और फिल्मी पहलू है ऋषि नाम का वह किरदार, जो खुद को त्रिपाठी का सिपहसालार कहता है। चर्चाओं के बाजार गरम हैं कि ऋषि ने अपने ही आका यानी श्री त्रिपाठी को ब्लैकमेलिंग के मकडज़ाल में ऐसा उलझाया है कि साहब चाहकर भी अपना दामन नहीं छुड़ा पा रहे। ऋषि के पास सुरक्षित कुछ आपत्तिजनक ऑडियो रिकॉर्डिंग्स वह जादुई चाभी हैं, जिससे विभाग के ताले खुलते और बंद होते हैं। कहा जा रहा है कि इस ऑडियो बम का खौफ इतना है कि इससे पहले भी कई अधिकारी अपनी वर्दी की साख बचाने के लिए मैदान छोडक़र भाग खड़े हुए। आखिर उन रिकॉर्डिंग्स में ऐसे कौन से दफन राज हैं? क्या उनमें भ्रष्टाचार की बोलियां हैं या कुछ और यह जांच का विषय है, लेकिन फिलहाल तो उस ऑडियो के डर से पूरा महकमा ऋषि की उंगलियों पर कथ्थक कर रहा है।
दाग अभी धुले नहीं, नए कीचड़ की तैयारी
श्री त्रिपाठी का इतिहास ब्यौहारी पदस्थापना के दौरान भी स्वर्णिम रहा है, बेशक वह चमक भ्रष्टाचार की थी। पुराने कारनामों की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि उन्होंने अपने नए कार्यक्षेत्र में अवैध शराब के सिंडिकेट को अपनी छत्रछाया दे दी। सिंदुरी से लेकर सिंहपुर तक की हर गली में बिकने वाली अवैध शराब की बोतल पर त्रिपाठी टैक्स फिक्स है। व्यंग्य की बात देखिए, जिस अधिकारी को नशे के खिलाफ जंग लडऩी थी, वह खुद माफियाओं के लिए सुरक्षा कवच बनकर खड़ा है।
क्या आलाधिकारी धृतराष्ट्र बन चुके हैं?
सवाल यह उठता है कि क्या शहडोल पुलिस और प्रशासन के आलाधिकारियों को इस त्रिपाठी-ऋषि गठबंधन की भनक नहीं है या फिर सफेद मार्शल से उतरने वाला चढ़ावा ऊपर तक अपनी पहुंच बना चुका है, सिंदुरी, अंतरा जैसे कई गांव की जनता नशे के गर्त में जा रही है, युवा बर्बाद हो रहे हैं, लेकिन खाकी की साख सरेआम नीलाम की जा रही है।
ईमानदारों का घुट रहा दम
यह तो महज झांकी है, असली फिल्म अभी बाकी है। ऋषि की उस मैजिकल ऑडियो रिकॉर्डिंग ने विभाग के ईमानदार अधिकारियों का जीना मुहाल कर रखा है। जो अधिकारी भ्रष्टाचार के इस खेल में शामिल नहीं होना चाहते, उन्हें इसी रिकॉर्डिंग और ट्रांसफर-पोस्टिंग का डर दिखाकर चुप करा दिया जाता है। ब्यौहारी के दागदार इतिहास और शहडोल की वर्तमान बदहाली को देखते हुए क्या शासन इस त्रिपाठी सिंडिकेट की उच्चस्तरीय जांच कराएगा या फिर ऋषि के ऑडियो बम के डर से न्याय की कुर्सी पर बैठे लोग इसी तरह सरेंडर करते रहेंगे।
अगले अंक में पढ़ें— कैसे ऑडियो रिकॉर्डिंग के डर से हिला विभाग और किन-किन गलियों से होकर गुजरता है अवैध वसूली का यह काला धन। बने रहिए हमारे साथ…
अजय पाल







